
नरसिंहपुर (जयलोक)। द्वारका के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी सरस्वती ने अपने प्रवचन में कहा कि मुख्य मंत्र:द्वे विद्ये वेदितव्ये — परा चापरा च।प्रात: बेला में जैसे सूर्य की प्रथम किरणें अंधकार को मिटाकर दिव्यता का उद्घोष करती हैं, वैसे ही मुंडकोपनिषद् का यह मंत्र मानव जीवन को दो प्रकार की विद्याओं की ओर उन्मुख करता है—अपरा (निचली) और परा (उच्च)।अपरा विद्या वह है जिससे हम संसार के व्यवहार को जानें वेद, व्याकरण, गणित, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि।परा विद्या वह है जिससे ‘अक्षर’, अर्थात परमात्मा का साक्षात्कार हो। वही आगे पूज्य गुरुदेव ने कहा:संसार की समस्त शिक्षा तब तक अपूर्ण है जब तक आत्मा की अनुभूति न हो। जिसने स्वयं को जाना, उसी ने परा विद्या पाई।गुरुदेव ने जीवन की गति को दो दिशाओं में बाँटते हुए कहा> अपरा विद्या से हम समाज बनाते हैं, परा विद्या से हम आत्मा को पहचानते हैं।
अपरा विद्या साधन है, परा विद्या साध्य है।जिसे जान लेने के बाद कुछ शेष नहीं रहता, वही परा विद्या है। श्रोताओं को अंत में आत्मचिंतन हेतु यह मंत्र दोहराने कहा गया: स विद्या या विमुक्तये वही विद्या है जो मुक्ति दे। सांध्यकालीन कथा प्रवचन मेपूज्य जगतगुरु शंकराचार्य द्वारका शारदापीठाधीश्वरसदानंद सरस्वती जी महाराज नेभक्त और भगवान का मिलन शबरी चरित्र के बारे में बताया18वें दिन की कथा में भगवान श्रीराम के जीवन की वह मधुरतम घटना सुनाई गई, जब वे शबरी के आश्रम में पहुँचे। यह कथा भक्तिभाव और प्रतीक्षा की चरम अवस्था का वर्णन करती है। पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी कहाशबरी कोई जाति नहीं, शबरी एक प्रतीक्षा का नाम है। शबरी एक श्रद्धा है, जो कहती है –‘भगवान कभी देर कर सकते हैं, लेकिन आते अवश्य हैं।’शबरी ने जूठे बेर क्यों खिलाए? उत्तर में बताया गया:वह जूठा नहीं था, वह तो प्रेम की परीक्षा थी।प्रेम जब छलकता है, तो नियम पीछे छूट जाते हैं।प्रभु ने बेर क्यों खाए?
क्योंकि बेर में शबरी का हृदय मिला था।कथा के माध्यम से बताया गया किभगवान को पाने के लिए विद्या, बल, धन, रूप की आवश्यकता नहीं — आवश्यकता है भक्ति, प्रतीक्षा और निष्कलंक प्रेम की। शबरी की भाँति हर हृदय को अपने भीतर आशा की दीपशिखा जलाए रखनी चाहिए। राम तो उसी पथ पर आते हैं, जहाँ किसी ने प्रेम से पगडंडी बनाई हो। वहीं जहां एक और
सुबह मुंडकोपनिषद ने जहाँ ब्रह्मविद्या की गहराई दिखाई, वहीं संध्या कथा ने भक्ति का सहज मार्ग बताया।एक ओर बुद्धि से आत्मा की खोज, दूसरी ओर हृदय से प्रभु का आलिंगन। पूज्य गुरुदेव ने दिन के अंत में यही कहा जिन्हें आत्मा का बोध हो और प्रभु से प्रेम हो — वही सच्चा साधक है।

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