
सत्यम तिवारी
जबलपुर (जयलोक)। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ सख्त प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर रखे हैं। जिस पर फौरन अमलीजामा पहनाने में प्रशासन ने ही लापरवाही और लेटलतीफी और उदासीनता दिखाई? परिणाम ये हुआ कि भयानक शोर अपनी हदें पार कर गया और जब जिंदगियों को मौत की कभी ना टूट सकने वाली नींद सुलाने लगा तब कहीं जाकर प्रशासन नींद से जागा और कार्रवाई शुरु की। देखा ये गया कि प्रशासन के लेटलतीफ प्रतिबंध आदेश से जहाँ एक ओर जनता को कुछ आंशिक राहत मिली तो वहीं डीजे संचालकों में असुरक्षा और उपेक्षा का भाव उभर गया। वे इक_े हुए और अपने धंधे, रोजगार, कमाई और लागत की दुहाई देने लगे। डीजे संचालकों का कहना था कि उन्होंने कर्जा लेकर डीजे बनवाया और अब इस पर अचानक रोक उनके हित में नहीं है। संचालकों के इस तर्क को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता क्योंकि कोई भी संचालक अपनी मर्जी से कहीं डीजे नहीं बजाता बल्कि वह ऑर्डर का इंतज़ार करता है और यह ऑर्डर उसे आयोजक ही देते हैं। मगर सवाल फिर वहीं लौटता है कि क्या सिर्फ अपनी मौज मस्ती और धंधे से कमाई, लागत निकालने की शर्त पर लोगों को मौत रूपी शोर का श्राप दिया जाना उचित है, क्या भयानक शोर करके पर्व की परंपरा और सौम्यता और शांति का गला घोंट देना उचित है, डीजे संचालकों को भी शांति और गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर सिर्फ अपनी कमाई या लागत निकालने के लिए बदले में समाज को क्या दे रहे हैं, कानफोड़ू शोर, मकान दुकान हिलाकर रख देने वाला भयानक बाइब्रेशन, विवाद, प्रतिशोधात्मक प्रतिस्पर्धा, क्या आपको कभी महसूस नहीं होता कि इस पागलपन के धंधे से भले आपकी मु_ी में नोट आ रहे हैं मगर आपके द्वारा की जा रही कर्कश धम्म धम्म और भोंडा बाइब्रेशन बच्चों को, बुजुर्गों को, विद्यार्थियों को क्या दे रहा है, क्या इसे संगीत कहते हैं नई पीढ़ी के युवा संचालकों को यदि मालूम ना हो तो कृपया पता करें कि पर्व तो तब से मनाए जा रहे हैं जब साउण्ड का ही अविष्कार नहीं हुआ था। गुजऱे दौर में पर्वों पर लाउड स्पीकर जिसे चुंगा भी कहते थे लगाने का चलन शुरु किया गया। शायद उसे ही पर्वों की गरिमा के चीरहरण का आरंभ भी कह सकते हैं क्योंकि उस दौर में भी जनता शोर के खिलाफ थी। आयोजक बिजली के खंबों पर चुंगे बंधवाते और फिर तेज़ और तेज़ की डिमांड साउण्ड वाले से करते थे, उस समय भी विवाद ही होते थे और शिकायतें पुलिस तक पहुंचती थीं। ये कोहराम जब थमने की बजाए और बढ़ता ही गया तब बहुत वक्त बीत जाने के बाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को ही सख्त प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करना पड़ा, इधर भयानक शोर ने जब पर्यावरण का हाल बेहाल कर डाला तब जाकर राष्ट्रीय हारित अधिकरण एनजीटी ने भी शोर की सीमा रेखा तय की।
दुकान मकान की नीव हिला देने वाला भयंकर शोर ही यदि आपका धंधा है तो जऱा एक बार अपने काम पर विचार करें। यह बात किसी एक के लिए सभी के लिए समानता से है।
क्या आप वाकई इस बात से अनजान हैं कि शांत वातावरण का काल बन चुके आपके डीजे के बेहद कर्कश शोर, ढोल, बम पटाखों का ही ये परिणाम है कि आज लोग शहर से बाहर दूर कहीं भागकर बसने को मजबूर हो रहे हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई कर सकें। उनका परिवार चैन से सो सके? दिन भर काम धाम की भागदौड़ और टेंशन के बाद शाम या रात को जब वे अपने घर लौटें तो उन्हें असीम शांति का माहौल मिले। वहाँ डेवलपर्स भी लोगों को यह बताकर अपना धंधा चमका रहे हैं कि उनका क्षेत्र खुला, हरा भरा और सबसे प्रमुख शांति से परिपूर्ण है। यहाँ किसी प्रकार का डीजे, ढोल, बम पटाखों का शोर नहीं होता है और इस शर्त पर लोगों से ज़मीनों के मन मुताबिक दाम वसूले जा रहे हैं। नाराज़ मत होइये बल्कि विचार कीजिए कि मौकों की आड़ लेकर सिर्फ अपनी कमाई के लिए हम श्रद्धा और आस्था बढ़ा रहे है या महज़ वाहियाद शोर शराबे के माध्यम से उन्माद को बढ़ावा देकर अपनी परंपरा और संस्कारधानी के साथ शांति का सत्यानाश कर रहे हैं।

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