
जबलपुर (जय लोक)। शहर में रेत का अवैध कारोबार जमकर फल फूल रहा है। आज 25 से 26 हजार रूपये में एक डम्पर रेत बिक रही है। जिले में वैध रेत खनन की प्रक्रिया बार-बार अटकने का फायदा अब अवैध कारोबारियों को मिलता दिखाई दे रहा है। पिछले एक वर्ष में रेत खदानों की निविदा प्रक्रिया चार बार निरस्त हो चुकी है। वर्षा ऋतु को देखते हुए नई प्रक्रिया भी अक्टूबर तक रोक दी गई है। ऐसे में नदी घाटों पर रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन का खेल तेजी से बढऩे की शिकायतें सामने आ रही हैं। नर्मदा सहित जिले की विभिन्न नदियों के घाटों से बिना वैध अनुमति और रॉयल्टी के रेत निकाले जाने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपरों के जरिए बड़ी मात्रा में रेत बाजार तक पहुंचाई जा रही है। इससे शासन को राजस्व का नुकसान होने के साथ ही नदी तटों के प्राकृतिक स्वरूप पर भी असर पड़ रहा है।

अंधेरा होते ही बढ़ जाती है गतिविधि
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार दिन की तुलना में रात के समय अवैध उत्खनन अधिक तेजी से होने की शिकायतें हैं। नदी किनारे भारी मशीनें पहुंचने और उनके जरिए रेत निकालने की गतिविधियां देर रात तक चलने की बात कही जा रही है। इसके बाद रेत से लदे वाहन विभिन्न मार्गों से शहर और आसपास के इलाकों की ओर रवाना होते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि लगातार आवाजाही के कारण नदी तटों के आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहीं, बारिश के मौसम में नदी का जलस्तर बढऩे के बावजूद रेत निकालने का काम किए जाने से श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

कार्रवाई होती है, लेकिन कारोबार फिर शुरू
रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन के खिलाफ समय-समय पर कार्रवाई किए जाने के बावजूद इस पर स्थायी रोक नहीं लग पा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ वाहनों या मशीनों पर कार्रवाई के बाद कुछ समय के लिए गतिविधियां थमती हैं, लेकिन हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। इस पूरे मामले में खनिज, राजस्व और पुलिस विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि नदी घाटों पर बड़े पैमाने पर मशीनों से उत्खनन और वाहनों से परिवहन हो रहा है तो जिम्मेदार अमला इसे रोकने में क्यों नाकाम है, यह सवाल अब उठने लगा है।


नदी के साथ राजस्व को भी नुकसान
अवैध खनन का असर केवल सरकारी राजस्व तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार नदी के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ होने पर तटों के कटाव, जल प्रवाह में बदलाव और जलीय पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बरसात के मौसम में यह स्थिति और संवेदनशील हो जाती है। अब जबकि वैध रेत खदानों की नई प्रक्रिया अक्टूबर के बाद शुरू होने की संभावना है, तब तक नदी घाटों की निगरानी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। सवाल यह है कि वैध खनन प्रक्रिया बंद रहने की अवधि में नदी से निकल रही रेत पर किसकी नजर है और शासन के राजस्व को हो रहे संभावित नुकसान की भरपाई कैसे होगी?
अक्टूबर तक खदानों की वैध प्रक्रिया पर विराम है, लेकिन यदि नदी घाटों पर अवैध उत्खनन जारी रहा तो यह विराम रेत कारोबारियों के लिए अवसर और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
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Author: Jai Lok





