
अर्जुन के एकतरफा निर्णय पर भगवान् झुँझलाए नहीं, क्रुद्ध नहीं हुए बल्कि स्मित मुस्कान के साथ बोले। यह भगवान् की निर्लिप्तिता प्रदर्शित करती है। यही गीता का केंद्रीय संदेश है जो वह हमें देना चाहती है – जीवन की हर परिस्थिति का सामना मुस्कुराते हुए करना। श्रीकृष्ण का जीवन गीता की सर्वश्रेष्ठ टीका है।
ओम प्रकाश श्रीवास्तव
आईएएस अधिकारी तथा
धर्म और अध्यात्म के साधक
अर्जुन ने भगवान् से अपने कल्याण के लिए मार्गदर्शन करने की प्रार्थना की और उनका शिष्य बनकर शरणागत हो गया। इसके बाद उसे धैर्यपूर्वक भगवान् का उत्तर सुनना चाहिए था परंतु अर्जुन का द्वंद्व इतना अधिक था कि वह भगवान् के उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर उन्हें फिर समझाने लगा – ‘क्योंकि इस सारी पृथ्वी का शत्रुहीन और धन-धान्य से संपन्न राज्य प्राप्त करके अथवा देवताओं का अधिपत्य पाकर भी वास्तव में मुझे ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को मिटा सके (गीता 2.8)’। अर्जुन ने युद्ध के लाभ हानि की जो गणना की थी उसमें जीतने पर राज्य सुख तो मिलना था पर साथ में स्वजनों के विछोह का दु:ख भी होना था। सुख की तुलना में दु:ख इतना ज्यादा था कि उसकी नजर में यह अच्छा सौदा नहीं था। वह अभी नहीं जानता था कि मोह जनित इस सुख-दु:ख से परे भी उच्च जीवन का विधान है। इसलिए अर्जुन ने अपना अंतिम निर्णय सुना दिया। ‘संजय कहते हैं निद्रा को जीतनेवाले, शत्रुओं को संतप्त करनेवाले अर्जुन, भगवान् हृषीकेश से ऐसा कहकर और फिर गोविन्द से स्पष्टतया ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ ये वचन बोलकर चुप हो गये (2.9)’। मोह के प्रभाव के कारण अर्जुन को लग रहा है कि उसका ज्ञान पूर्ण है। इसलिए उसका अहं नए सुझाव को सुनने के लिए तैयार ही नहीं है और पूर्ण समर्पण में बाधा डाल रहा है। वह शिष्य भी बन रहा है और निर्णय भी सुना रहा है। संजय कहते हैं – ‘हे भरतवंशी धृतराष्ट्र ! तब अंतर्यामी भगवान् ने दोनों सेनाओं के बीच में विषाद करते हुए अर्जुन से हँसते हुए से यह वचन कहे (2.10)’। युद्ध की कठिन तनाव की परिस्थिति में भगवान् का ‘हँसते हुए से’ बोलने से पता चलता है कि उनका अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण है, उन्हें कोई भ्रम नहीं है। जरा सोचें, जीवन की थोड़ी सी प्रतिकूल स्थिति में हम कितने उद्वेलित हो जाते हैं। जब मन पर नियंत्रण नहीं होता तब हम घटना की तत्काल प्रतिक्रिया (रिएक्शन) देते हैं। यह विवेक बुद्धि के बिना स्वत: होता है। जैसे क्रोध में गाली-गलौच करने लगते हैं, भय में चेहरा फक पड़ जाता है, काँपने लगते हैं और काम और लोभ में सारा ज्ञान और नैतिकता धरी रह जाती है। इसके विपरीत यदि आत्मनियंत्रण होता है तो धैर्यपूर्वक प्रतिउत्तर (रिस्पांस) देते हैं। श्रीकृष्ण के जीवन में इतनी विकट परिस्थितियाँ आई हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। कारागार में जन्म होते ही मृत्यु का संकट, माता-पिता का बिछोह, पूतना, शकटासुर, तृणावर्त जैसे राक्षसों द्वारा निरंतर मारने का प्रयास, कालियानाग से युद्ध, इंद्र के कोप से बचने के लिए गोवर्धन धारण करना, कंस का वध, जरासंध से युद्ध में भागकर द्वारका पहुँचना आदि। पर श्रीकृष्ण सदैव मुस्कुराते रहे, हर स्थिति का सामना विलक्षण आत्मनियंत्रण से किया। अर्जुन के एकतरफा निर्णय पर भगवान् झुँझलाए नहीं, क्रुद्ध नहीं हुए बल्कि स्मित मुस्कान के साथ बोले। यह भगवान् की निर्लिप्तिता प्रदर्शित करती है। यही गीता का केंद्रीय संदेश है जो वह हमें देना चाहती है – जीवन की हर परिस्थिति का सामना मुस्कुराते हुए करना। श्रीकृष्ण का जीवन गीता की सर्वश्रेष्ठ टीका है। अब श्लोक 2.11 से 2.38 तक भगवान् सांख्य के अनुसार तत्त्वज्ञान का उपदेश देते हैं। एक बात अक्सर पूछी जाती है कि युद्ध के मैदान में तत्त्वज्ञान देने का क्या औचित्य था आइए इसे समझें। अपने स्वरूप (नित्य, अविनाशी) और जगत् की वास्तविकता (अनित्यत, विनाशी) का ज्ञान न होने के कारण अहंकार उत्पन्न होता है जिससे व्यक्ति अपने को कर्ता मानने लगता है। संबंधियों को, धन-संपत्ति को अपना और स्वयं को उनका मानता है । वह स्वयं को सांसारिक अनित्य वस्तुओं तक सीमित कर लेता है। वह मानता है कि उसका इन सांसारिक वस्तुओं से संबंध सदैव एक सा रहेगा, वह सदैव उसे सुख देती रहेंगीं। अत: वह उनके प्रति आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति मोह को जन्म देती है। संसार का स्वभाव ही निरंतर बदलते रहना है। संबंधियों से संबंध बनते-बिगड़ते हैं, उनकी मृत्यु होती है, धन-संपत्ति ज्यादा-कम होती है, संसार में यश के साथ अपयश भी मिलता है । वह इन परिवर्तनों को रोक नहीं पाता है इसलिए अपने को असहाय महसूस करता है और शोक और विषाद ग्रस्त हो जाता है। इस बीमारी का स्थाई इलाज है आत्मज्ञान करा देना ताकि वह जीव, जगत् और ईश्वर के वास्तविक संबंध को समझ सके। एक उदाहरण देखें। हम स्थूल दृष्टि, भावनात्मक दृष्टि और बौद्धिक दृष्टि से जगत् को अलग-अलग रूपों में देखते हैं। जैसे स्थूल आँख से देखने पर जो स्त्री दिखाई देती है वही भावना के आधार पर माँ, बहन, बेटी या पत्नी हो जाती है। बुद्धि का उपयोग करने पर वही मोटी-पतली, काली-गोरी, सुंदर-कुरूप आदि दिखाई देगी। पर जब उसी को आत्मदृष्टि से देखेंगे तो वह ईश्वर का अंश दिखाई देगी। तब उसकी भौतिक सुंदरता या कुरूपता आदि गौण हो जाएगी। भौतिक, भावनात्मक या बौद्धि दृष्टि से देखने पर जो राग-द्वेष पैदा हुए थे वह आत्मज्ञान की दृष्टि से देखते ही तिरोहित हो जाएँगे। भगवान् भी अर्जुन को आत्मज्ञान की दृष्टि देकर उसके अज्ञान को, जो मोह की जड़ है, समाप्त करना चाहते हैं। इसलिए ‘भगवान् कहते हैं – तू जिनका शोक नहीं करना चाहिए उनके लिए शोक करता है और पण्डित की तरह वचन बोलता है। पण्डित लोग तो जो मर गये हैं और जो जीवित हैं किसी के लिए भी शोक नहीं करते (2.11)’। हम ईश्वर के अंश हैं। जो विशुद्ध बुद्धि हमारे भीतर के इस दिव्यत्व को जान सकती है उसे पण्डा कहते हैं। जिनके पास ऐसी बुद्धि है वे पण्डित कहे जाते हैं। जब हम बुद्धि से स्वतंत्र चिंतन नहीं करते बल्कि उसका उपयोग पहले से मन में जमी धारणाओं, दुराग्रहों के समर्थन में करते हैं तो उसे प्रज्ञावाद कहते हैं। वर्तमान समाज में यह बीमारी बहुत बढ़ गई है। दक्षिणपंथी, वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, धर्मांध, समाजवादी, पूँजीवादी आदि सभी बुद्धि का उपयोग अपने पक्ष समर्थन और दूसरों के खंडन में कर रहे हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चिंतन का अभाव आज की बड़ी समस्या है जिस पर समाज का ध्यान नहीं जा रहा है। अर्जुन परिस्थिति की निष्पक्ष विवेचना नहीं कर पा रहा था। उसकी समझ में जो ‘ज्ञान’ था उसी की पुष्टि के लिए वह तर्कों का दुरुपयोग कर रहा था। वह जिस ज्ञान की बातें कर रहा था उसके जीवन में उतरा नहीं था इसलिए साथ में शोक भी कर रहा था। कथनी और करनी में फर्क था। इसलिए भगवान् उसे प्रज्ञावादी कहते हैं। सृष्टि में दो ही चीजें हैं सत् और असत्। सत् अविनाशी है और असत् एक क्षण के लिए भी स्थाई नहीं है वह निरंतर विनाश की ओर जा रहा है। इसलिए भगवान् कहते हैं कि इन दोनों के लिए ही शोक करने का कारण नहीं है। (क्रमश:)






