
(जय लोक)। बिहार से अलग हुए झारखंड का एक मशहूर शहर है ‘धनबाद’ जिसे कोयला राजधानी भी कहा जाता है वहां आबकारी विभाग द्वारा जब्त की गई आठ सौ से ज्यादा दारू की बोतलें अचानक गायब हो गईं। दरअसल बोतलें गायब नहीं हुई थी उनमें भरी हुई दारू गायब हो गई थी। आठ सौ बोतल दारु गायब हो जाए तो विभाग में हडक़ंप मच गया। जांच पड़ताल हुई तो इसका आरोप जिस जगह दारू की बोतलें रखी थीं उस इलाके के चूहों पर लगा दिया गया यह कहा गया कि बोतलों के ढक्कनों को कुतरकर ये चूहे अपनी पूंछ उन बोतलों में डाल देते थे और फिर उस पूछ को चूस चूस कर दारू पी लेते थे। अब ये चूहे अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन नहीं कर पा रहे थे क्योंकि उनके पास ना तो कोई वकील था, ना कोई अखबार, और ना ही उनसे कोई टीवी रिपोर्टर उनके पास उनकी ‘बाइट’ लेने आया था कि आप लोगों ने दारू पी है या नहीं। अब जिसके पास खंडन का कोई रास्ता नहीं तो उन बेचारे ने अपने आप को दोषी मान लिया, लेकिन कहते हैं ना कि जिसका कोई नहीं उसका तो ‘खुदा है यारों’ किसी आरटीआई एक्टिविस्ट ने आवेदन दे दिया कि आठ सौ बोतल दारू गायब होने में भारी लफड़ा है जिस तरह से चूहों पर आरोप लगाया जा रहा है वे दस बीस बोतल दारु तो पी सकते हैं लेकिन आठ सौ बोतल दारु पीना उनकी बस की बात नहीं है। अब जब आरटीआई एक्टिविस्ट ने जांच की मांग करी तो सरकार ने मध्य निषेध विभाग को जांच सौंपी और मध्य निषेध विभाग ने जांच करके बताया कि जिन चूहों पर दारू पीने का आरोप है वे ‘बेदाग’ हैं इन्होंने जिंदगी में कभी दारू चखी तक नहीं और उन पर बेवजह दारु पीने का आरोप लगा दिया गया। साँच को आंच नहीं आखिरकार वे तमाम चूहे आज खुशी से झूम रहे हैं कि कम से कम उन पर लगा झूठा आरोप सचमुच में झूठा सिद्ध हो गया इसलिए पुरानी कहावत यही है कि ‘सच की हमेशा जीत होती है’ लेकिन अब सवाल ये है कि अगर ये चूहे बेदाग थे तो आठ सौ बोतल दारू किसने गटक ली। अब इस बात की खोज मध्य निषेध विभाग कर रहा है कि असली दारुखोर कौन है। देखते हैं कि मध्य निषेध विभाग अब इसका दोष किस पर मढ़ता है अपने को तो इस विभाग के पुराने रिकॉर्ड देखकर यही लगता है कि विभाग में ही कुछ ऐसे महान लोग रहे होंगे जिन्होंने यह करतब दिखा दिया होगा और आरोप चूहों पर लगा दिया होगा। वे सोचते होंगे कि चूहों से कौन पूछने जाएगा और वे बेचारे अपनी सफाई कैसे देंगे लेकिन उन्हें मालूम नहीं था कि जिन चूहों को फंसाने के चक्कर में थे वे चूहे बुद्धि के देवता ‘भगवान गणेश’ के वाहन होते हैं और जिसके वाहक खुद भगवान गणेश हों उनके वाहन पर ऐसे गलत आरोप कोई कैसे लगा सकता हैं।
आप तो मंत्री हो हुजूर – केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी कई बार बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं। हाल ही में उन्होंने कहा कि दिल्ली में भारी प्रदूषण है इसलिए वो दिल्ली में रहना नहीं चाहते। यदि दिल्ली में आना भी पड़ता है तो आने के पहले जाने का रिजर्वेशन पहले से ही करवा लेते हैं और ज्यादा से ज्यादा दो या तीन दिन दिल्ली में बिताते हैं। अब नितिन जी को कौन समझाए कि हुजूर आप मंत्री हो आपके लिए सारी चीजें बहुत आसान हैं दिल्ली में रहो ना रहो मंत्री तो बने रहोगे लेकिन उन बेचारे दिल्ली वासियों की भी तो सोचो जो साल के पूरे तीन सौ पैंसठ दिन इसी प्रदूषण में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। वे कहां की वापसी का रिजर्वेशन करवा लें ‘जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां’ वाला गाना उनके जीवन में चरितार्थ होता है। आपका क्या है हवाई जहाज फ्री, ट्रेन फ्री, चाहे नागपुर हो, चाहे मुंबई हो, चाहे दिल्ली हो, सब जगह सरकारी बंगले हैं, नौकर चाकर हैं, अंगरक्षक हैं जब जहां मर्जी आए चले जाओ कोई कुछ नहीं बोलने वाला लेकिन दिल्ली के प्रदूषण से पीठ दिखाकर भागने से अच्छा है कि अब तो आपकी सरकार दिल्ली में है और आप तो वैसे ही बहुत पावरफुल मंत्री माने जाते हैं तो अपनी सरकार से कहें कि दिल्ली का प्रदूषण कम करने का कोई प्रयास किया जाए इससे दिल्ली वालों को तो राहत मिलेगी ही आपको भी बार-बार दिल्ली, नागपुर, मुंबई अप डाउन करने से बचाव हो सकेगा। दिल्ली वासी आशा करते हैं कि शायद ये काम आप कर पाएंगे।
आशा से आसमान टंगा – पिछले दिनों ‘विश्व उम्मीद दिवस’ मनाया गया उम्मीद यानी ‘आशा’ वो आशा इसके बारे में कहावत है कि ‘आशा से आसमान टंगा है’ और सचमुच हर व्यक्ति की जिंदगी उम्मीद पर ही टिकी है। आम आदमी को उम्मीद है कि उसके अच्छे दिन आएंगे, सरकारी कर्मचारी को उम्मीद है कि उसका वेतन बढ़ेगा, उसे प्रमोशन मिलेगा, विद्यार्थी को इस बात की उम्मीद है कि उसके पेपर अच्छे गए हैं तो उसको अच्छे नंबर मिलेंगे, व्यापारी को इस बात की आशा है कि आज उसके दुकान में अच्छी खासी बिक्री होगी, वकील को उम्मीद है कि उसके पास कोई अच्छा खासा क्लाइंट आएगा, डॉक्टर को इस बात की उम्मीद है कि अस्पताल में रोगियों की भीड़ लग जाएगी, किसी भी पॉलीटिकल पार्टी के कार्यकर्ता को यह उम्मीद रहती है कि हो सकता है उसे पार्षद बनने का मौका मिल जाए, पार्षद को उससे बड़ी उम्मीद है कि वो विधायक बन जाए, विधायक की आशा है कि वो मंत्री बन जाए, और मंत्री की आशा है कि वो प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाए। इधर हर लडक़ी सपने में यही उम्मीद लगाए हैं कि उसे अच्छा खासा कमाने वाला पति मिल जाए तो लडक़ा इस आशा में है कि उसकी होने वाली बीबी खूबसूरत हो यानी कुल मिलाकर हर व्यक्ति इसी उम्मीद में जी रहा है और जब हर तरफ उम्मीद का बाजार गर्म है। ऐसे में यदि विश्व उम्मीद दिवस मनाया गया तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अपना तो मानना है कि साल भर में काहे के लिए हर महीने उम्मीद दिवस मनाना चाहिए हो सकता है और किसी की उम्मीद पूरी हो ना हो कम से कम आम जनता की उम्मीद तो पूरी हो जाए जो उसने अपनी अपनी सरकारों से लगा कर रखी है।

सुपर हिट ऑफ द वीक
‘मैं तुम्हारी नीली शर्ट प्रेस कर रही थी,
तो शर्ट एक जगह थोड़ी सी जल गई’ श्रीमती जी ने श्रीमान जी से कहा
‘कोई बात नहीं, मेरे पास वैसी ही एक और नीली शर्ट है’ श्रीमान जी ने उत्तर दिया
‘मुझे मालूम था, इसलिए उस शर्ट का उतना कपड़ा काटकर,
मैने इस जली हुई शर्ट में जोड़ दिया है और तब से श्रीमानजी बेहोश हैं।

Author: Jai Lok







