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शिवपद की प्राप्ति साध्य है- डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्दतीर्थ जी महाराज

रायपुर (जयलोक)।  श्री शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला रायपुर में चातुर्मास प्रवचन माला के अंतर्गत शिव पुराण की दिव्य अमृतमयी कथा सुनाते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि शिव पद की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए शिव का अर्थ होता है कल्याण जो सारी सृष्टि का कल्याण करें वह शिव कहलाता है। श का अर्थ नित्य सुख व का अर्थ अमृत और ई का अर्थ पुरुष इन दो शब्दों के मिलने से शिव शब्द की निष्पत्ति होती है जिसका अर्थ होता है जिससे नित्य सुख की प्राप्ति हो और वह शिव शब्द वा‘य होता है। जिसमें सारा विश्व प्रपंच शयन करें, जो सारे विश्व का आधार हो वह शिव तत्व कहलाता है, जो दैत्य और देवों के लिए सम हो वह शिव तत्व कहलाता है।
भगवान शिव के समस्त उपासक हैं और भगवान शिव  समस्त देव दानवों के प्रेमास्पद है। प्राणी को वेदों के अनुसार कर्म करते हुए जिस फल की प्राप्ति होती है वह फल भगवान श्री शिव के चरणों में समर्पित कर देने से शिवपद की प्राप्ति हो जाती है कर्म करते हुए भी निष्कर्मता को प्राप्त करना ही कर्म के द्वारा मुक्ति का श्रेष्ठ साधन है वास्तव में परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करने के तीन मार्ग हैं एक ज्ञान का मार्ग दूसरा भक्ति का मार्ग और तीसरा कर्म का मार्ग ज्ञान का मार्ग बड़ा कठिन होता है जिसमें चलना दुष्कर होता है इस मार्ग में चलना संभव नहीं है, भक्ति का मार्ग व्यक्ति को सरल तो महसूस होता है किंतु निष्ठा और श्रद्धा के न बनने के कारण इसमें भी जीवात्मा को परेशानी होती है किंतु कर्म के मार्ग का यदि आलंबन किया जाए और अपने आप को कर्ता भोक्तापन से हटा लिया जाए तो निश्चित ही हमें शिवपद की प्राप्ति हो जाती है शिव पद की प्राप्ति श्रवण मनन और निनिध्यासन  के द्वारा प्राप्त की जाती है जो व्यक्ति श्रवण  मनन और निनिध्यासन करने में असमर्थ हैं वह भगवान शिव की उपासना करके प्राप्त होने वाले फल को यदि शिव को समर्पित कर देंगे तो उनके जीवन का कल्याण हो जाएगा और वह कम उनके मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर देगा। आगे और स्वामी जी ने बताया की जिसके घर में केवल शिव पुराण की पोथी होती है, उसके घर को तीर्थ माना जाता है और जहॉ शिव पुराण की पोथी रखी है उस घर में जो प्राणी निवास करता है उसको तीर्थ निवास का पुण्य प्राप्त होता है।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने मंगलाचरण करके पोथी का पूजन कर आरती करने के पश्चात कथा प्रारंभ हुई।

जिस जाति के माता-पिता से जन्म हुआ वह कभी परिवर्तित नहीं हो सकती शङ्कराचार्य स्वामी श्रीसदानंद सरस्वती जी महाराज

Jai Lok
Author: Jai Lok

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