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‘सावन’ की जरूरत ही क्या? जब पूरे साल झूले झूल रहा है आम आदमी…

(जय लोक)। पुराने लोगों को इस बात का बड़ा रंज है कि अब सावन में पहले जैसे झूले नहीं लगते, पहले के जमाने में जब सावन आता था तो झूलों की बहार शुरू हो जाती थी, पेड़ों पर रस्सियों के झूले के साथ-साथ छोटे छोटे मेलों में टेंपरेरी झूला भी लग जाता था जिसे ‘हिंडोला’ कहा जाता था, बच्चे और महिलाएं इन हिंडोलों में बैठकर जो झूला झूलती थीं उसका अलग आनंद आता था पर वक्त बदल गया है, अब नया जमाना है भैया, नए-नए झूले आ गए हैं, देखा नहीं  जब कभी प्रदर्शनी लगती है उसमें तरह-तरह के झूले लगते हैं लोग उसमें बैठ तो जाते हैं पर जब वो स्पीड पकड़ता है तो ऐसी चिल्लाचोंट मचाते हैं जैसे उनकी जान जाने वाली हो, लेकिन बात हो रही है झूले की, कि अब सावन में झूले नहीं लगते, अब इन मासूमों को कौन समझाए कि कौन कहता है सावन में झूले नहीं लगते यहां तो पूरे साल झूले लगे हुए हैं और हर आदमी उन झूलों में झूल रहा है ये बात अलहदा है कि उसे ये अदृश्य झूले दिखाई नहीं दे रहे हैं। नेता, मंत्री आम जनता को अपने वादों का झूला झूला रहे हैं, ये झूला खूब ऊपर जाता है और फिर धड़ाम से नीचे आ जाता है, वैसे ये बड़ा पुराना झूला है, जब से देश आजाद हुआ है ये तब से चल रहा है और जनता लगातार झूले में झूल रही है। अर्थव्यवस्था का जो झूला है वो भी बहुत तेज झूल रहा है लेकिन ये ऊपर कम जाता है नीचे बहुत तेजी से आता है। बेरोजगार नौजवान रोजगार पाने का झूला झूल रहे है वे इस आशा में झूले का इंतजार कर रहे हैं कि जैसे ही झूला उनकी तरफ  आएगा वे उसे पकड़ कर उसमें लटक जाएंगे पर ये झूला गोदाम में बंद हो चुका है जिसके बाहर निकलने की उम्मीद कम ही है। शेयर मार्केट का झूला तो इतनी स्पीड से ऊपर नीचे होता है कि खरीदने वाले कभी नोट कमा नहीं पाते क्योंकि ये झूला कब ऊपर चला जाए कब नीचे आ जाए ‘नोबडी नोज’। झूले और भी हैं अभी तो निजी नौकरी करने वाले इस असमंजस के झूले पर झूल रहे हैं कि उन्हें तनख्वाह मिलेगी कि नहीं मिलेगी। ‘पत्रकार’ अपनी संस्था के झूले में बैठे हैं जिसमें उन्हें ये नहीं पता है कि मालिक उन्हें कब झूले से नीचे धकेल देगा। जहां तक विदेश का सवाल है  हमारे प्रधानमंत्री ने चीन के प्रधानमंत्री को झूले में बैठा कर उन्हें झूला झुलाया था, अब वही चीन हमें झूले पर बैठाए हुए है कभी यहां कब्जा करता है तो कभी वहां कब्जा करता है। अपने शहर जबलपुर की बात करें तो एक हजार करोड़ की लागत से बन रहे फ्लाईओवर के नीचे की सडक़े शहर वासियों को इतने झूले झुला चुकी हैं कि उन्हें सपने में भी झूले दिखाई देते हैं और वे उसे एक डरावना सपना मानकर चीख कर उठ जाते हैं। स्मार्ट सिटी का झूला बड़े तामझाम के साथ आया था पर आज तक वो झूला पूरा झूला नहीं झूल पाया। सावन, छोड़ो भादों छोड़ो क्वार, कार्तिक, अगहन, मास पूस, फाल्गुन, चैत, बैसाख यानी पूरे साल जनता तो झूला झूलती है। यानी कुल मिला कर पूरा देश, पूरा प्रदेश, पूरा शहर तरह-तरह के झूलों का आनंद उठा रहा है। उसे ना सावन की राह देखने की जरूरत है ना भादो की, चौतरफा झूले लगे हुए हैं और लोग झूल रहे हैं अब जो लोग सावन में झूले ना लगने का रंज मना रहे थे उनको इस बात से संतोष जरूर हो गया होगा कि देश में झूलों की कमी नहीं है झुलाने वाला चाहिए झूलने वाले तो लाखों हैं।

 

जानवरों से ज्यादा खतरनाक
ब्रिटेन में वेलिंग फोर्ड, ऑक्सफोर्ड शाचर के सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी के एक सर्वे में एक चीज सामने आई है कि जिन जानवरों को हम बेहद खतरनाक समझते हैं या जिन्हें शिकारी जानवर कहते हैं उनसे तीन सौ गुना ज्यादा खतरनाक इंसान होता है। स्थिति ये है कि इन इंसानों के कारण तीस फीसदी जानवर गायब होते जा रहे हैं, कहा जाता है कि भगवान ने इंसान को दिमाग दिया है जानवरों के पास दिमाग नहीं होता लेकिन अपना तो मानना है कि अगर भगवान इंसानों को दिमाग ना देता तो ज्यादा अच्छा होता है कम से कम वो खतरनाक तो ना बनता। शिकारी जानवर भी तब शिकार करता है जब उसे भूख लगी रहती है लेकिन इंसान को तो चौबीस घंटे पैसे की भूख होती है। खतरनाक जानवर अपने भविष्य के लिए ना तो शिकार करता है और ना ही उसे जोडक़र रखता है। लेकिन ये इंसान अपनी सात पीढ़ी के लिए माल जोडक़र रखना चाहता है भले ही उसके लिए उसे कितने ही तरह-तरह के आर्थिक अपराध क्यों न करना पड़े। वैसे भी इंसान की जो जाति है उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे अवगुण ऊपर वाले ने पहले ही भर दिए थे ताकि वो भगवान की जगह ना ले सके, झूठ झक्कर, बेईमानी, दुश्मनी, रंजिश, अपराध जैसी तमाम बुराइयां इंसान के भीतर है और फिर ये तो कलयुग है, कलयुग का इंसान कितना साफ  सुथरा, कितना सच्चरित्र, कितना ईमानदार, कितना भोला हो सकता है यह सोचना भी अपने आप को भ्रम में डालने जैसा है। इसलिए जो सर्वे किया गया है उसमें पूरी तरह से सच्चाई है लेकिन इस बात का रंज है कि ये सर्वे बहुत पहले हो जाना चाहिए था, हो सकता है इस सर्वे से शर्म खाकर कम से कम दस बीस परसेंट जानवरों की जान तो बच जाती खैर जब जागे तभी सवेरा।

 

पर इनसे कैसे बचोगे
बेंगलुरु के ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च की है जिसमें यदि किसी व्यक्ति को सांप काट ले तो उसे सिर्फ  एक गोली देना होगी और वह जहरीले से जहरीले सांप के जहर को भी बेअसर कर देगी इस गोली को सीधे मुंह में लिया जा सकता है। इन वैज्ञानिकों ने सांपों के लिए तो गोली बना दी लेकिन ‘आस्तीन’ में छुपे सांपों के लिए कौन सी गोली होगी ये आज तक ना कोई वैज्ञानिक बना पाया है और ना ही कोई डॉक्टर। किसकी आस्तीन में कौन सा सांप छुपा है यह किसी को नहीं मालूम राजनीति में ही देख लो जिंदगी भर जो पार्टी तरह-तरह के पद देती है सत्ता से उतरते ही नेताजी तुरंत दूसरी पार्टी में पहुंच जाते हैं, निजी नौकरी करने वाले जैसे ही किसी दूसरी कंपनी से ज्यादा पैसे का ऑफर आता है अपनी कंपनी को छोड़ रातोंरात दूसरी कंपनी ज्वाइन कर लेते हैं। आस्तीन में छुपे सांप किसी को दिखाई नहीं देते वे तो तब बाहर आते हैं जब इंसान को अलसेट पड़ जाती है। जिस इंसान को अच्छा समझा जाता है वो कब धोखा दे जाए कह नहीं सकते। यहां तक की परिवारों में भी प्रॉपर्टी को लेकर जो झगड़े चलते हैं वे भी इसी आस्तीन के सांप की तरह होते हैं। जिन भाइयों ने अपना बचपन एक साथ बिताया वे बड़े होते ही एक दूसरे के दुश्मन हो जाते हैं। अपनी तो बेंगलुरु के वैज्ञानिकों से एक ही मांग है कि भले ही जहरीले सांपों के जहर के लिए आप गोली बनाओ न बनाओ लेकिन इन आस्तीनों के सांपों से छुटकारा पाने के लिए कोई ना कोई रिसर्च करो क्योंकि ये आस्तीन के साथ जहरीले सांपों से ज्यादा खतरनाक होते हैं।

सुपर हिट ऑफ  द वीक
‘ये कैसी फोटो खींची है तुमने मेरी, पीछे कुत्ता दिखाई दे रहा है, ये मुझे फेसबुक पर डालनी थी…! ‘श्रीमान जी ने गुस्से में श्रीमती जी से कहा’
हां तो उसमें क्या हो गया, लिख दो कि मैं आगे वाला हूं…!श्रीमती जी ने उत्तर दिया।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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