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विल्ववृक्ष में समस्त तीर्थो का निवास डॉ.स्वामि इन्दुभवानन्द तीर्थ

रायपुर (जयलोक) । शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला रायपुर में चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को आगे बढ़ाते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द  तीर्थ ने शिव पुराण की कथा के प्रसंग में बताया कि बेल के वृक्ष में संसार के समस्त तीर्थो का निवास होता है। बेल के वृक्ष के दर्शन करने मात्र से व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता जो पुण्यात्मा वेलवृक्ष के नीचे भगवान शिवलिंग की मूर्ति रखकर पूजन करता है वह निश्चित ही शिव के स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
जो बेल के वृक्ष के मूल में भगवान शंकर का अभिषेक करता है वह समस्त तीर्थो में स्नान करने के पुण्य को प्राप्त कर लेता है। जो वृक्ष बेल की जड़ में पानी देता है उस पर भगवान अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। भारतीय सनातन परंपरा में वृक्षों की सेवा का बड़ा महत्व माना गया है शास्त्रों में यहां तक लिखा है की 10 पुत्र पैदा करने का जो पुण्य प्राप्त होता है वह एक वृक्ष की सेवा करने मात्र से प्राप्त हो जाता है वृक्ष निष्काम भाव से पूरी प्रकृति की सेवा करते हैं इसलिए उनमें भी प्राण वायु मानी जाती है, साक्षात देवताओं का निवास भी वृक्षों में होता है।

सर्वविध वृक्ष मानव जाति की सेवा और उपकार के लिए तत्पर रहते हैं। रहते हैं अत:  वृक्षों को काटना महान से महान पाप माना जाता है। जो बेल वृक्ष में आधार के साथ दीप माला का दान करता है वह तत्व ज्ञान से ओतप्रोत हो जाता है। बेल के दर्शन करने मात्र से व्यक्ति पाप से मुक्त हो जाता है जो भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाता है वह करोड़ों कन्यादान के पुण्य को प्राप्त कर लेता है। आगे सुधि वक्ता ने बताया कि जिसके मुख में शिव का नाम हैं, मस्तक में भष्म है, गले में रुद्राक्ष की माला होती है। वह परम पुण्यशाली माना जाता है उसके दर्शन मात्र से मनुष्य को त्रिवेणी स्नान करने  का पुण्य प्राप्त होता है।

जिनके मस्तक में विभूति नहीं है, अंग में रुद्राक्ष नहीं है और मुख में शिव महिमा का गायन नहीं है उस, व्यक्ति सर्वविध परित्याग कर देना चाहिए भगवान शिव का नाम गंगा है भस्म यमुना है तथा रुद्राक्ष को सरस्वती का रूप कहा गया है इन तीनों की संयुक्त त्रिवेणी समस्त पापों को नाश करने वाली है। जिसके गले में यह त्रिवेणी रहती है वह प्राणी भी दर्शनीय होता है।
कथा के पूर्व जगतगुरु कलाम के छात्रों ने मंगलाचरण किया तथा समस्त भक्तों ने आरती करके कथा श्रवण की।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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