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जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्रीसदानंद सरस्वती जी महाराज ने श्री सिद्धेश्वर महादेव का किया पूजन

नरसिंहपुर (जयलोक)। श्रावण मास के चतुर्थ श्रावण सोमवार में पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्रीसदानंद सरस्वती जी महाराज ने श्री सिद्धेश्वर महादेव का पूजनअभिषेक किया। श्री वाल्मीकि रामायण की आज की कथा में पूज्य जगद्गुरु जी महाराज ने उपदेश किया- राजा का धर्म और रानी का भ्रम जब एक राजा धर्म का वरण करता है तब उसके राज्य के देवता भी वंदन करते हैं,लेकिन जब एक रानी मोह और माया में बहकर निर्णय लेती है, तब इतिहास की धारा तक बदल जाती है। जनक का नीति-संवाद राम में राजा की छवि-जनक बोले- मैं बूढ़ा हो गया हूं राम मैं तुम्हें जो बताने जा रहा हूं वह सुनो राम! राज्य काआधार केवल सेनानहीं, नीति है। शस्त्रोंसे राज्य जीता जासकता है, पर हृदयनीति से ही जीते जातेहैं।राजा वही जो सब वर्णों का पोषण करे — ब्राह्मण को शिक्षा, क्षत्रिय को रणभूमि,वैश्य को व्यापार और शूद्र को मान।राम ने चरण छूते हुए कहा मैं राज्य नहीं चाहता,केवल सेवा चाहता हूं।जनक मुस्कुराए यही सोच तुझे राज्यके योग्य बनाती है।राज्याभिषेक की घोषणा और हर्ष का वातावरण:राजा जनक ने सभा में राज्याभिषेक की घोषणा की। मंत्रियों को आदेश मिला राम काराज्याभिषेक तुरंत प्रारंभ हो। नगरसजाया जाए।

धर्मका राज्य लौट रहाहै।सुमंतजी को विशेष आदेश मिला राम को रथ में महललाओ, यह केवलएक राजा नहीं धर्म का अवतार आने वाला है।पूरा नगरदीप मालिकाओं से सजा, तोरणद्वार बने, मंगलगान हुआ। प्रजा पुलकित थी।लेकिन उसी समय महल के एक कोने मेंजहां दीप नहीं,वहां एक छाया थी जहां नीति नहीं, वहां मंथरा थी मंथरा और कैकेयी की कुटिल वार्ता इतिहास की दिशा बदलने लगी:मंथरा ने रानी कैकेयी को रोका और कहा:राज्याभिषेक की ध्वनि सुनकर हर्षितमत हो रानी, वहराज्य तुम्हारे पुत्रभरत का होनाचाहिए। यह तो केवलकोशल की साजिशहै राम को राजा बनाकर तुम्हेंदरकिनार किया जारहा है। कैकेयी अचंभित- क्या तू सच कह रही है, मंथरा? मंथरा (चालाकी से मुस्कुराते हुए)- राम के राजा बनते ही भरत वन भेज दिए जाएंगे, और आप एकसाधारण रानी बनकररह जाएंगी।

क्या यहीन्याय है? कैकेयी का मोह जाग उठा। उसके हृदय मेंकर्तव्य और माया के द्वंद्व प्रारंभ हो गया। मंथरा ने आगे कहा: राजा दशरथ ने तुम्हें दो वरदान दिए थे आज मांगो भरत काराज्याभिषेक औरराम को चौदह वर्षोंका वनवास। एक क्षण में जो राज्याभिषेक की रात्रि होनी थी, वह रण की पूर्वपीठिका बन गई।

धर्म का पथ कठिनहै पर उस पर अडिग रहना ही रामत्व है। नीति के सिंहासन को तात्कालिक लोभ, भय या मोह छिन्न कर सकते हैं — पर सच्चा धर्म हर बार अंधकार में से भी ज्योति ले आता है।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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