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एक बार साफ-साफ बतला दो, करोगे कि नहीं…

चैतन्य भट्ट
(जय लोक)। प्रदेश में निगमों, मंडलों आयोगों प्राधिकरणों में राजनीतिक नियुक्तियाँ का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है अपने को तो ये मालूम था कि हर चीज का अंत हो जाता है लेकिन ये नहीं मालूम था कि अपने ही प्रदेश में निगमों, मंडलों आयोगों, प्राधिकरणों में राजनीतिक नियुक्तियों का अंत कभी नहीं होगा।

कितने सावन, कितने फागुन, कितने माघ, कितने पूस, कितने जेठ, कितने बैसाख, और भी न जाने कितने मौसम निकल गए, गर्मी निकल गई, बरसात निकल गई, ठंड निकल गई अब फिर गर्मी आने वाली है लेकिन नियुक्तियों का नियुक्ति पत्र अभी तक किसी भी नेता के पास नहीं पहुँचा। पहले बिहार चुनाव की फांस, फिर मुख्यमंत्री का लफड़ा, फिर महाराष्ट्र निकाय निकायों के चुनाव, फिर महापौरों  की झंझट, फिर पुराना साल, फिर नया साल, फिर मकर संक्रांति, फिर गणतंत्र दिवस, फिर बड़ा दिन, फिर बताया गया कि नहीं अब फरवरी के फस्र्ट वीक में तो किसी भी परिस्थिति में ये तमाम नियुक्तियां कर ही दी जाएंगी, वे तमाम नेता जो बेचारे पिछले तीन साल से इंतजार कर रहे थे खुश हो गए कि अब तो सारे कंटक दूर हो चुके हैं  नियुक्तियाँ हो ही जाएंगी, लेकिन फिर एक खबर आई कि नहीं नहीं अभी इसकी आशा मत करो क्योंकि अभी प्रदेश सरकार का बजट आने वाला है। अब जब बजट आ गया है तो उसका क्या रिपरकेशन जनता पर पड़ता है उसके बाद ही इस बारे में विचार किया जाएगा। 18 तारीख को प्रदेश का बजट भी आ गया। नेताओं ने बजट के तारीफों के पुल भी बांध दिए बता दिया कि आज तक ऐसा  बजट आया ही नहीं। अब तो नियुक्ति दे दो भैया लेकिन-चार दिन तो बीत गए अभी तक नियुक्तियों की कोई खबर है नहीं जो नेता मंडलों निगमों, प्राधिकरणों आयोगों में नियुक्ति की राह देख रहे हैं उनके कुर्ते पजामे का कलफ टूट गया, सफेद कुर्ते पैजामे मैले हो गए लेकिन कोई खबर नहीं आई।

अपने को तो समझ में नहीं आता कि यदि हाई कमान को इन नियुक्तियों को नहीं करना है तो एक बार साफ-साफ उन उम्मीदवारों को बता क्यों नहीं दिया जाता कि तुम लोग बेवजह परेशान मत हो और ना ही आशा करो, हम लोग कोई नियुक्तियाँ नहीं करेंगे। एक बार साफ-साफ बता दोगे तो कम से कम रोज-रोज की झंझट और रोज के इंतजार से तो उन तमाम नेताओं को मुक्ति मिल जाएगी जो पिछले तीन साल से अपनी आँखों में आशा का दीप जलाए बैठे हैं, लेकिन कहते हैं ना कि आशा से आसमान टंगा है इसलिए वे भी आशा नहीं छोड़ रहे। उनका एक ही गीत है ‘कभी ना कभी, कहीं ना कहीं कोई ना कोई नियुक्ति आदेश तो आएगा कुर्सी पर मुझे बिठाएगा’ अब देखना ये है कि हाई कमान जीतता है या इन नेताओं की आशा।

लूट सके तो लूट

‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट अंत काल पछताएगा प्राण जाएंगे छूट’ ये बड़ा पुराना दोहा है लेकिन इस दोहे को देशभर के बैंकों ने अपना लिया है। एक खबर आई है कि तमाम बैंकों ने ‘मिनिमम बैलेंस’ के नाम पर अपने खातेदारों से ग्यारह हजार करोड़ रूपया कमा लिया जिन-जिन के खाते में मिनिमम बैलेंस नहीं था और जैसे ही उनका बैलेंस आया उसमें से उन्होंने उनका पैसा काट लिया और देखते-देखते यह राशि ग्यारह हजार करोड रुपए तक पहुँच गई, अभी अभी तो ये सिर्फ सरकारी बैंकों का मसला सामने आया है प्राइवेट बैंकों ने कितना माल लूट लिया है इसके आंकड़े तो अभी सामने आए ही नहीं हैं। आदमी बैंक में पैसा इसलिए रखता है कि जब जरूरत होगी तब निकाल लेगा एक तरफ सरकार जीरो बैलेंस पर खाता खुला रही है और इधर बेचारा मध्यम वर्गीय आदमी यदि मिनिमम बैलेंस नहीं रख पा रहा तो उसके पैसे बैंक वाले काटे पड़े हैं। अपने को तो लगता है कि ये तमाम बैंक वाले अपने कर्मचारियों की तनख्वाह इसी मिनिमम बैलेंस के नाम पर काटी गई राशि से बांट रहे हैं हर बैंक ने अपनी अपनी मिनिमम राशि तय कर दी है लेकिन कोई बोलने वाला नहीं। वैसे इसमें  बैंकों का कोई दोष नहीं है जब हर सरकारी दफ्तर में रिश्वत के नाम पर लूट मची हुई है तो फिर बैंक भला क्यों पीछे रहे, बैंकों में रिश्वत का कोई ज्यादा स्कोप होता नहीं है तो उन्होंने सोचा कि मिनिमम बैलेंस के नाम पर माल कमा लो। लोग बाग मांग कर रहे हैं कि ये मिनिमम बैलेंस वाला लफड़ा खत्म करो लेकिन अपने को मालूम है कि बैंक वाले फ्री फोकट में मिलने वाली करोड़ों की राशि छोडऩे के लिए कैसे तैयार होंगे। अपनी तो लोगों को यही सलाह है कि भैया अपना पैसा अपने घर में रखो मिनिमम भी रहेगा तो कोई काटने वाला तो है नहीं, इनके चक्कर में पड़ोगे तो जितना जमा नहीं करोगे उससे ज्यादा वे काट लेंगे।

दारुखोरों की चांदी

सुना है कि 31 मार्च को प्रदेश के शराब के ठेके खत्म हो जाएंगे और नए ठेकों की शुरुआत होगी इसलिए स्टॉक का क्लीयरेंस करना बहुत जरूरी हो गया है शराब ठेकेदारों के लिए। इसलिए शराब ठेकेदारों ने अपनी शराब की कीमतों में तीस से लेकर पचास फीसदी की कमी कर दी है इस बात को लेकर दारुखोर सोसायटी में भारी खुशी और उल्लास का वातावरण है जो एक पाव पी रहा  था वह अद्धा  सुलटा रहा है जो आधा पाव पीता था वो पूरी बोतल गुटक रहा है और क्यों न पिए जब आधे दाम में माल मिल रहा है तो फिर पीने का मजा तो अपने आप बढ़ जाता है। कई जमाखोर तो अभी से दारू की बोतल खरीदे पड़े हैं क्योंकि दारू की कोई ‘एक्सपायरी डेट’ तो होती नहीं, कहा तो ये जाता है कि जो दारू जितनी पुरानी होती है उसका नशा उतना ही जबरदस्त होता है। इधर ठेकेदार भी सोच रहा है कि  स्टॉक  क्लीयरेंस तो करना ही है ले जाने दो जिसको जितनी ले जानी है अपने माल की तो खपत तो हो रही है। सरकार भी दारू पीने वालों के लिए बड़ी मेहरबान रहती है क्योंकि उसका खजाना भी तो यही दारू प्रेमी भरते हैं। दारू न होगी तो खजाने में माल कैसे आएगा इसलिए हर साल नए ठेके सरकार देती है। प्रदेश के कई शहरों में पचास फीसदी छूट के साथ शराब मिल रही है इसलिए उस शहर के आसपास के लोग उस शहर में जाकर माल इकठ्ठा करके अपने शहर वापस आ रहे हैं। चलो किसी ने तो इन रिंदों का ध्यान रखा यही क्या कम है।

सुपर हिट ऑफ द वीक

प्रेम में असफल अपने दोस्त को श्रीमान जी ने ज्ञान देते हुए कहा
‘अगर कोई लडक़ी आपको घास नहीं डालती तो निराश मत होइए क्योंकि आप गधे नहीं इंसान हो’

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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