
(जयलोक)। भारत में एथनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2014-15 में मात्र 1.5 प्रतिशत ब्लेंडिंग से शुरू होकर 2025 तक 20 प्रतिशत का लक्ष्य पांच साल पहले हासिल कर लिया गया। सरकार का दावा है कि इससे विदेशी मुद्रा भंडार में बचत हुई, किसानों की आय बढ़ी और कार्बन उत्सर्जन कम हुआ। लेकिन आम जनता, खासकर पुरानी गाडिय़ों के मालिक, माइलेज घटने, इंजन क्षति और बढ़ती लागत की शिकायतें कर रहे हैं। पानी की भारी खपत और लागत-प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह लेख निष्पक्ष रूप से तथ्यों पर आधारित गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
एथनॉल ब्लेंडिंग क्या है और इसका उद्देश्य?एथनॉल मुख्यत: गन्ने की मोलासेस या अन्य कृषि अवशेषों से बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर 10 प्रतिशत, 20 प्रतिशत या अधिक ब्लेंड तैयार किया जाता है। भारत में इसका मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल के आयात को कम करना है, जो देश की कुल आयात का बड़ा हिस्सा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, सफल 20 प्रतिशत कार्यक्रम से सालाना लगभग 4 अरब डॉलर यानी करीब 30,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।लाभ:* ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक बचत: कार्यक्रम शुरू होने से अब तक इसमें लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई गई, लाखों मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात कम हुआ और करोड़ों टन कार्बन उत्सर्जन घटाया गया।?• किसानों के लिए फायदा: गन्ना किसानों को अतिरिक्त बाजार मिला। लाखों करोड़ रुपये उनके खाते में गए, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। पर्यावरण: एथनॉल में ऑक्सीजन अधिक होती है, जो पूर्ण दहन में मदद करती है।
इससे हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनोऑक्साइड और कण प्रदूषण कम निकलते हैं। जीवन-चक्र विश्लेषण में 20-30 प्रतिशत ब्लेंड कार्बन समकक्ष उत्सर्जन, जीवाश्म ईंधन उपयोग और कण निर्माण में उल्लेखनीय कमी दिखाते हैं। ये आंकड़े आकर्षक हैं, लेकिन पूरी तस्वीर अलग है।जनता का पक्ष: माइलेज, लागत और रोजमर्रा की परेशानी?आम उपभोक्ता के लिए ईंधन की कीमत सबसे महत्वपूर्ण है। एथनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से करीब 30 प्रतिशत कम है। इसलिए सैद्धांतिक रूप से माइलेज कम होना स्वाभाविक है। वाहन निर्माताओं के संगठन के अनुसार, 20 प्रतिशत ब्लेंड से आधुनिक गाडिय़ों में 2 से 4 प्रतिशत माइलेज गिरावट होती है, जबकि पुरानी गाडिय़ों में 3 से 6 प्रतिशत या अधिक। कई ड्राइवर 4 से 10 प्रतिशत तक की शिकायत कर रहे हैं, जिससे रिफ्यूलिंग अधिक बार करनी पड़ती है और कुल लागत बढ़ जाती है।पुरानी गाडिय़ां सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। एथनॉल नमी सोखने वाला है, जिससे ईंधन प्रणाली में जंग लग सकती है। रबर, प्लास्टिक और कुछ धातु के पार्ट्स खराब हो सकते हैं। पुराने कार्बोरेटर इंजन वाले वाहनों में समस्या ज्यादा है। कई मोटरसाइकिल और कार मालिक इंजन में लालिमा वाली जंग या प्रदर्शन गिरावट की शिकायत कर रहे हैं। हालांकि सरकार और तेल कंपनियां कहती हैं कि 20 प्रतिशत ब्लेंड सुरक्षित है और आधुनिक गाडिय़ां इसके अनुकूल हैं, लेकिन सडक़ पर करोड़ों पुरानी गाडिय़ां हैं।जनता पूछती है—अगर एथनॉल सस्ता है तो ब्लेंडेड पेट्रोल क्यों महंगा? उत्पादन लागत कम होने के बावजूद खुदरा मूल्य पेट्रोल जैसा रखा जाता है, जिससे उपभोक्ता को माइलेज नुकसान का पूरा बोझ उठाना पड़ता है। कुछ राज्यों में शुद्ध पेट्रोल की मांग बढ़ रही है, लेकिन विकल्प सीमित हैं।एथनॉल उत्पादन में पानी का बेतहाशा उपयोग?यह सबसे गंभीर चिंता है। भारत पानी की कमी वाला देश है, जहां कई जिले पहले से जल-तनावग्रस्त हैं। नीति आयोग के अनुसार, 1 लीटर एथनॉल बनाने के लिए गन्ने से करीब 2,860 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इसमें मुख्यत: सिंचाई शामिल है।गन्ना पानी-गहन फसल है।
महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां एथनॉल प्लांट बढ़ रहे हैं, भूजल स्तर गिर रहा है। जीवन-चक्र विश्लेषण में एथनॉल ब्लेंड से भूमि और पानी उपयोग में वृद्धि दर्ज हुई है। 2070 तक अतिरिक्त पानी की मांग बढ़ सकती है।दूसरी पीढ़ी के एथनॉल का पानी फुटप्रिंट कम है, लेकिन वर्तमान में अधिकांश गन्ने-आधारित है। उर्वरक और कीटनाशकों से मानव विषाक्तता भी बढ़ती है। नीति-निर्माताओं को सतत खेती और दूसरी पीढ़ी पर जोर देना चाहिए, अन्यथा जल संकट गहराएगा। लागत-प्रभावशीलता: वास्तविकता बनाम दावासरकार का दावा है कि एथनॉल सस्ता और कुशल है। लेकिन वास्तव में:* उपभोक्ता स्तर पर माइलेज घाटे से प्रभावी लागत बढ़ती है। राष्ट्रीय स्तर पर आयात बचत और किसान आय वास्तविक हैं, लेकिन पानी, भूमि उपयोग, खाद्य सुरक्षा और सब्सिडी का पूरा हिसाब लगाना जरूरी है। अध्ययनों में 20-30 प्रतिशत ब्लेंड सबसे संतुलित पाए गए, लेकिन पूर्ण सततता के लिए बेहतर कृषि प्रथाएं और प्रौद्योगिकी जरूरी।एथनॉल प्लांट्स पर निवेश बढ़ा है, लेकिन कुछ विशेषज्ञ कृषि आपदा की चेतावनी देते हैं, भोजन को ईंधन में बदलने से गरीबों पर असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत?एथनॉल ब्लेंडिंग भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता और पर्यावरण लक्ष्यों के लिए महत्वपूर्ण कदम है। यह किसानों को सशक्त बनाता है, उत्सर्जन कम करता है और विदेशी निर्भरता घटाता है। लेकिन जनता की शिकायतें, पुरानी गाडिय़ों का नुकसान, पानी का अत्यधिक उपयोग और दीर्घकालिक पर्यावरणीय लागत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।सुझाव:-पुरानी गाडिय़ों के लिए 10 प्रतिशत ब्लेंड विकल्प उपलब्ध कराएं।?20 प्रतिशत अनुकूल वाहनों को प्रोत्साहन दें। पानी-कुशल फसलें, ड्रिप सिंचाई और दूसरी पीढ़ी के एथनॉल पर निवेश बढ़ाएं।पारदर्शी मूल्य निर्धारण ताकि उपभोक्ता को माइलेज नुकसान की भरपाई मिले।स्वतंत्र अध्ययन और सार्वजनिक बहस जारी रखें।एथनॉल ब्लेंडिंग कोई जादू नहीं है। यह एक समझौता है, राष्ट्रीय हित बनाम व्यक्तिगत और पर्यावरणीय लागत। यदि नीतियां सावधानीपूर्वक और सतत तरीके से लागू हों, तो यह सफल हो सकती है। अन्यथा, यह आम आदमी की जेब और देश के जल संसाधनों पर बोझ बन जाएगी। समय आ गया है कि हम सिर्फ लक्ष्य हासिल करने से आगे सोचें, सच्ची स्थिरता की।
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Author: Jai Lok






