Download Our App

Home » जबलपुर » पश्चाताप का द्वार कभी बंद नहीं होता, जहाँ एक पापी राजा का कोढ़ भी शिव-दर्शन मात्र से धुल गया, उज्जैन के 84 महादेवश्री लुम्पेश्वर महादेव (41वें महादेव)

पश्चाताप का द्वार कभी बंद नहीं होता, जहाँ एक पापी राजा का कोढ़ भी शिव-दर्शन मात्र से धुल गया, उज्जैन के 84 महादेवश्री लुम्पेश्वर महादेव (41वें महादेव)

डॉ. नवीन आनंद जोशी
(जयलोक)। उज्जैन की पावन धरा, जिसे साक्षात् महाकाल वन कहा जाता है, केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की नगरी भर नहीं — यहाँ चौरासी महादेवों के रूप में देवाधिदेव भगवान शिव के अनगिनत स्वरूप युगों से भक्तों को दर्शन देते आए हैं। इसी पावन शृंखला में 41वें स्थान पर विराजमान हैं श्री लुम्पेश्वर महादेव — भैरवगढ़ पुल के पार, महाकाल वन क्षेत्र में केशवार्क महादेव के समीप स्थित यह शिवलिंग एक ऐसी कथा समेटे हुए है जो पाप, दंड और अंतत: शिव-कृपा से मिलने वाली मुक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
कथा के अनुसार प्राचीन काल में लुम्पाधिप नामक एक म्लेच्छ गणों का राजा था, जिसकी रानी विशाला थीं। एक बार कुछ ब्राह्मणों के आग्रह पर राजा युद्ध हेतु सागम ऋषि के आश्रम पहुँचा। वहाँ राजा ने आश्रम की कामधेनु गाय की माँग की। जब ऋषि ने यह माँग अस्वीकार कर दी, तो क्रोधित राजा ने न केवल कामधेनु गाय, बल्कि संपूर्ण आश्रम को ही नष्ट कर डाला, और अपने बाणों से स्वयं सागम ऋषि का वध कर दिया। यह प्रसंग हमें मानव-हृदय की उस भयावह अवस्था का स्मरण कराता है जब सत्ता और क्रोध विवेक पर हावी हो जाते हैं — जहाँ एक क्षण की उग्रता जीवन भर के लिए अपराध का बोझ बन जाती है।

कुछ ही देर बाद सागम ऋषि के पुत्र समिद्ध आश्रम पहुँचे। पिता को मृत देखकर वे शोक-विह्वल हो उठे, और अत्यंत पीड़ा में उन्होंने राजा को यह श्राप दे दिया कि वह कुष्ठ रोग से ग्रसित होगा। यह श्राप किसी क्रूरता से नहीं, बल्कि एक पुत्र की असहनीय वेदना से उपजा था — इसे समझना भी उतना ही आवश्यक है जितना राजा के अपराध को समझना। शीघ्र ही राजा कुष्ठ रोग से पीडि़त हो गया, और अंतत: जर्जर होकर मृत्यु की प्रतीक्षा में चिता पर जा लेटा।

ठीक उसी क्षण, जब राजा जीवन की अंतिम साँसें गिन रहा था, वहाँ स्वयं देवर्षि नारद प्रकट हुए। उन्होंने राजा को समिद्ध के श्राप का सत्य बताया, और साथ ही यह भी बताया कि इस श्राप से मुक्ति का एक मार्ग शेष है — महाकाल वन में केशवार्क महादेव के समीप स्थित एक शिवलिंग का श्रद्धापूर्वक दर्शन और पूजन। यह प्रसंग सनातन धर्म के उस सबसे करुणामय सिद्धांत को उजागर करता है कि चाहे पाप कितना भी घोर क्यों न हो, भगवान शिव की शरण में पश्चाताप और सच्ची भक्ति से मुक्ति का द्वार सदैव खुला रहता है।

नारद मुनि की बात सुनकर राजा तत्काल महाकाल वन की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर उसने अपनी रानी सहित पवित्र क्षिप्रा नदी में स्नान किया और अत्यंत श्रद्धा से शिवलिंग के दर्शन किए। कथा है कि दर्शन मात्र से राजा का वर्षों पुराना कुष्ठ रोग पूर्णत: समाप्त हो गया। कृतज्ञ राजा ने अपनी रानी के साथ वहाँ उपस्थित समस्त मुनियों का यथोचित सम्मान किया। चूँकि यह मुक्ति राजा लुम्पाधिप के पूजन से प्राप्त हुई, इसलिए यह शिवलिंग लुम्पेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु पूर्ण भक्ति-भाव से यहाँ पूजन करता है, उसके सात जन्मों के संचित पाप नष्ट होते हैं और अंतकाल में उसे परम पद की प्राप्ति होती है।
यह कथा आधुनिक मनुष्य के लिए भी अत्यंत गहन संदेश देती है। जीवन में क्रोध और अहंकार के वशीभूत होकर की गई भूलें भले ही कितनी भी गंभीर क्यों न हों, यदि मनुष्य सच्चे हृदय से पश्चाताप करे और भगवान शिव की शरण ग्रहण करे, तो कोई भी पाप स्थायी दंड नहीं बनता। लुम्पेश्वर महादेव हमें सिखाते हैं कि परिवर्तन और क्षमा का द्वार जीवन के अंतिम क्षण तक भी खुला रहता है — बशर्ते हृदय में सच्चा पश्चाताप हो।

श्रावण मास में इस शिवलिंग का विशेष महत्व और भी बढ़ जाता है। यह वह पावन मास है जब आशुतोष अपने भक्तों की प्रत्येक पुकार शीघ्रता से सुनते हैं, और जिस प्रकार राजा लुम्पाधिप ने श्रद्धा और स्नान-पूजन से मुक्ति पाई, उसी प्रकार श्रावण में क्षिप्रा स्नान और शिव-दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के जीवन के संचित दोष भी शांत होने की मान्यता है। महाकाल वन के इस कोने में आज भी जब कोई श्रद्धालु लुम्पेश्वर महादेव के दर्शन करता है, वह केवल एक प्राचीन शिवलिंग नहीं देखता — वह उस अनंत करुणा का साक्षात्कार करता है जो सबसे बड़े पापी को भी अपनाने से पीछे नहीं हटती।

जो सच्चे हृदय से पश्चाताप के साथ शिव की शरण में आता है, उसका सबसे बड़ा पाप भी दर्शन मात्र से धुल जाता है।॥ हर हर महादेव ॥
धर्म यात्रा निरंतर जारी..

 

राफेल-एम और कैरियर स्ट्राइक ग्रुप से बढ़ेगी भारत की समुद्री ताकत

Jai Lok
Author: Jai Lok

RELATED LATEST NEWS

Home » जबलपुर » पश्चाताप का द्वार कभी बंद नहीं होता, जहाँ एक पापी राजा का कोढ़ भी शिव-दर्शन मात्र से धुल गया, उज्जैन के 84 महादेवश्री लुम्पेश्वर महादेव (41वें महादेव)

Top Headlines

पश्चाताप का द्वार कभी बंद नहीं होता, जहाँ एक पापी राजा का कोढ़ भी शिव-दर्शन मात्र से धुल गया, उज्जैन के 84 महादेवश्री लुम्पेश्वर महादेव (41वें महादेव)

डॉ. नवीन आनंद जोशी (जयलोक)। उज्जैन की पावन धरा, जिसे साक्षात् महाकाल वन कहा जाता है, केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की

Live Cricket