
सत्यम तिवारी
जबलपुर (जय लोक)। सिर्फ नाम की शेष संस्कारधानी की उत्सव जीवी परंपरा में एक नया अध्याय महाकाली दशहरा चल समारोह बीते कुछ वर्षों से प्रारम्भ हो चुका है, उसका नाम भले काली दशहरा है मगर पूर्ण रूप से है वो महाडीजे दशहरा।

जो ये बताने का पुरजोर प्रयास करता है कि हमसे बढक़र कौन? इसका दर्शन और श्रवण लाभ आप शहर के मुख्य दशहरा चल समारोह के बाद ग्वारीघाट रोड पर भरपूर ले सकते हैं बशर्ते यदि आपके कान के पर्दे, ब्रेन की तरंगें और हार्ट का स्पंदन उस महागर्जन करती प्रचण्ड कर्कश ध्वनी शक्ति का बेरहम प्रहार सहने का सामथ्र्य रखता हो तो? वैसे इस तारीफ और गरिमा का हकदार सिर्फ वो इकलौते चल समारोह नहीं है बल्कि डीजे तो अब जैसे संस्कारधानी के समस्त आयोजनों का अनिवार्य अंग, मांग का सिंदूर और आयोजन का मकसद व प्राण निरुपित हो चुका है। ठीक वैसे जैसे जल बिन मछली, सिंदूर बिना सुहागन, और प्राण बिना शरीर होता है।

उत्सव, उल्लास, उमंग और भक्ति भावना के मददेनजऱ इस नवीन और असरदार डीजे को और भी अधिक शक्तिशाली वेग वाला बनाया जाना चाहिए, बल्कि सरकार, कानून और प्रशासन को चाहिए कि वे सर्वाधिक बेस की धमक और बाईब्रेशन की हद पार कर देने वाले डीजे साउंड संचालक और आयोजक समिति दोनों को किसी राजकीय या राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित करें क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से ये कार्य जनसंख्या नियंत्रण का ही कर रहे हैं। अभी इनके प्रयासों में परिणाम नगण्य ही हैं मगर जऱा और प्रोत्साहन मिले तो बात बन सकती है! हाल ही में अभी महज एक ही खबर ही आई है कि आसपास कहीं कोई डिवाइन स्कूल में सात साल की एक बच्ची का हार्ट फेल हो जाने की वजह से स्कूल में ही मौत हो गई। बताया गया कि स्कूल लगा था और स्कूल के सामने से ही कोई गणेश विसर्जन जुलूस निकला जिसमें महाकाय डीजे अपनी पूरी क्षमता से धमक रहा था, स्कूल के सामने आते ही डीजे के बाइब्रेशन और धमक को उस मासूम बच्ची का हृदय बर्दाश्त नहीं कर सका जिससे हार्ट फेल हुआ और बच्ची मौत की गहरी नींद सो गई? आगे कुछ लिख सकने का सामथ्र्य व आवश्यकता मेरी कलम महसूस नहीं कर रही।

Author: Jai Lok






