
बिप्लब देब की पहली बैठक में सरकार-संगठन समन्वय पर जोर
चंद्रशेखर तिवारी की नियुक्ति से संगठन की कमान का नया अध्याय
भोपाल (जयलोक)। मध्यप्रदेश भाजपा में एक साथ हुई दो अहम नियुक्तियों ने संगठन की दिशा पर नई बहस शुरू कर दी है। पूर्व त्रिपुरा मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब को प्रदेश प्रभारी और आरएसएस के अनुभवी प्रचारक चंद्रशेखर तिवारी को प्रदेश संगठन महामंत्री बनाया गया है। दोनों नियुक्तियां ऐसे समय हुई हैं जब भाजपा 2027 के नगरीय निकाय-पंचायत चुनाव और 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी में प्रवेश कर रही है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि देब की पहली ही बड़ी बैठक में सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय को प्रमुख मुद्दा बनाया गया। साथ ही 2023 में भाजपा से हारी 66 विधानसभा सीटों की संगठनात्मक स्थिति की समीक्षा का फैसला सामने आया।
प्रदेश संगठन महामंत्री का पद करीब आठ महीने खाली रहने के बाद चंद्रशेखर तिवारी को सौंपा गया है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके तिवारी अब मध्यप्रदेश के संगठन तंत्र की कमान संभालेंगे। यह पद केवल प्रशासनिक नहीं माना जाता; पार्टी संगठन, कार्यकर्ताओं और संघ के बीच समन्वय में इसकी केंद्रीय भूमिका होती है।
दूसरी ओर, देब की शैली भी संकेत दे रही है कि संगठन अब केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहता। उन्होंने नेताओं से जमीनी संपर्क, बूथ स्तर की सक्रियता और दिखावे के बजाय कार्यकर्ता-आधारित राजनीति पर जोर दिया है।
क्या बदल रहा है राजनीतिक समीकरण- यहीं से असली राजनीतिक सवाल शुरू होता है। मध्यप्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और अन्य वरिष्ठ नेताओं की अलग-अलग राजनीतिक भूमिकाएं हैं। देब के सामने इन प्रभावशाली नेताओं के बीच समन्वय कायम करना बड़ी चुनौती माना जा रहा है। सरकार और संगठन के बीच समन्वय पर सार्वजनिक रूप से जोर दिया जाना अपने आप में किसी टकराव का प्रमाण नहीं है। लेकिन नई संगठन टीम का गठन, बूथ से विधानसभा तक समीक्षा और केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय निगरानी यह जरूर बताती है कि भाजपा मध्यप्रदेश में अगले चुनावी चक्र के लिए संगठन को नए सिरे से कस रही है।आने वाला असली संकेत होगा—जिला संगठन में बदलाव, टिकटों पर प्रभाव, वरिष्ठ नेताओं के बीच जिम्मेदारियों का संतुलन और सरकार-संगठन की अगली संयुक्त बैठकों में लिए जाने वाले फैसले।
यानी फिलहाल सवाल यह नहीं कि भाजपा में टकराव है या नहीं; सवाल यह है कि नई संगठन टीम किसे कितना स्पेस देती है और मध्यप्रदेश भाजपा में सत्ता और संगठन के बीच संतुलन का नया मॉडल क्या होगा।





