
चैतन्य भट्ट, विशेष टिप्पणी
(जय लोक)। ‘सस्पेंड कर दिया’ ये मसला पिछले दो दिनों में राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है राजधानी दिल्ली में एक जर्जरतम पीजी की बिल्डिंग धराशाई होने से सात निर्दोष, बच्चों की मौत और मध्यप्रदेश के सागर में जहरीली शराब पीने से एक दर्जन लोगों की मौत के बाद कुछ अफसरों और कर्मचारियों को सस्पेंड कर कुछ को लूप लाइन में भेज दिया गया है। सवाल सबसे बड़ा तो ये है कि जिन लोगों की लापरवाही या मिलीभगत से कई निदोर्षों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा क्या उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन पर हत्या का मुकदमा नहीं चलाना चाहिए?
दरअसल देश और प्रदेश में भ्रष्टाचार और सरकारी सेवा में जानबूझकर की जा रही लापरवाही के मामले लगातार सुर्खियां बटोर रहे हैं। सरकारी प्रतिक्रिया में आमतौर पर आरोपियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया जाता है। माहौल कुछ ऐसा बनाया जाता है जैसे सस्पेंशन कोई बहुत बड़ी सजा है जो तत्काल सुना दी गई है। प्रश्न स्वाभाविक है : क्या सस्पेंशन वास्तविक रूप से कोई दंड है? जवाब है : हरगिज़ नहीं। निलंबन एक तरह की सामान्य व्यवस्था है जिसके लिए बिना सूचना सेवा से अनुपस्थिति जैसा छोटा सा आधार ही पर्याप्त है। इसका उद्देश्य आरोपित अधिकारी कर्मचारी को जांच कार्यवाही प्रभावित करने से रोकना है।
सरकारी नियमों में प्रावधान हैं कि सस्पेंशन पीरियड में संबंधित से कोई काम नहीं लिया जाता फिर भी मूल वेतन और अन्य भत्तों का 50 प्रतिशत जीवन निर्वाह भत्ता मिलता है जो छह महीने बाद 75 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। जांच में निर्दोष पाए जाने की स्थिति में सस्पेंशन अवधि सेवा और पेंशन के लिए गिनी जाती है और मोटी रकम एरियर्स के रूप में मिलती है। फिर भला सस्पेंशन सजा कैसे कही जा सकती है?
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार और ऐसे अन्य लापरवाही भरे कार्यों के लिए जिनमें न सिर्फ शासकीय धन की बरबादी हुई है बल्कि मासूम निदोर्षों की जान तक चली गई है, कार्यवाही को सस्पेंड करने जैसी सामान्य व्यवस्था तक सीमित रखना और उसे सजा जैसा प्रचारित किया जाना कितना उचित है ? पिछले कुछ महीनों में छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से हुई मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत, सफाई में पूरे देश में नंबर वन आने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से एक दर्जन लोगों की मौत जैसी जानलेवा लापरवाही से हुए इतने दर्दनाक हादसे के बाद तात्कालिक कार्यवाही सस्पेंड करने तक सीमित रही। बाद में भडक़े भीषण जन आक्रोश के बाद ही गिरफ्तारी जैसी अन्य कार्यवाहियां शुरू हुईं। जांच में बताया गया कि लापरवाही के तार भोपाल तक जुड़े हुए थे। रिटायर्ड अधिकारियों जीपी मेहरा और धर्मेंद्र सिंह भदौरिया के यहां पड़े छापों में बरामद करोड़ों की नगदी, किलो के हिसाब से सोना चांदी और अकूत संपत्ति ने भी सनसनी मचाई। 2025 में रिटायर्ड हुए मेहरा के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतें लंबित थीं मगर विभाग से जांच की अनुमति न मिलने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई। हद तो यह हुई कि इसके बावजूद मेहरा को वेयरहाउस कॉरपोरेशन में संविदा पर सेवाएं देने के लिए योग्य मान लिया गया। भदौरिया 2020 में निलंबित हुए और 2025 में रिटायर्ड हो गए। इतने लंबे समय बाद भी उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ताजा छापों के समय दोनों ही अधिकारी सेवा निवृत्त थे सो उनके सस्पेंड होने का सवाल नहीं उठता था मगर नियम संबंधी कोई रोड़ा न होने के बावजूद इन मामलों में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई।
नियमों में निलंबन के साथ ही ऐसे प्रकरणों में सेवा से बर्खास्तगी के प्रावधान भी हैं। किसी तरह का गैर कानूनी काम या सेवा नियमावली के उल्लंघन पर सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है। कोई सैलरी या भत्ता नहीं मिलता और दूसरी सरकारी नौकरी की पात्रता भी खत्म हो जाती है। बर्खास्तगी के पहले व्यापक विभागीय जांच प्रक्रिया जरुरी है। समयबद्ध जांच प्रक्रिया का प्रावधान है मगर जांच सालों चलती है। मामला ठंडा पड़ जाता है और आरोपी निर्दोष बरी हो जाते हैं। जिन चुनिंदा प्रकरणों में बर्खास्तगी की सजा मिलती भी है वे अदालत पहुंच जाते हैं और लचर जांच प्रक्रिया में हुई लापरवाही की वजह से बरी हो जाते हैं। जहां मर्जी होती है, सतही आधार पर बर्खास्तगी कर दी जाती है। मैहर में मिडिल स्कूल के एक शिक्षक को दो से अधिक संतान होने पर सेवामुक्त कर दिया गया। जिस नियम के आधार पर सेवामुक्ति हुई वह ऐसे उम्मीदवार जिसके दो से अधिक जीवित संतान हैं, जिनमें से एक का जन्म 26 जनवरी, 2001 या उसके बाद हो, के सेवा या पद पर नियुक्ति के लिए अपात्रता से संबंधित था जबकि संबंधित शिक्षक नियमित सेवा में था। अदालत से इसी आधार पर राहत मिल गई।
भ्रष्टाचार और सेवा में लापरवाही की बढ़ती घटनाएं गवाह हैं कि प्रशासनिक कसावट की जरूरत है। तात्कालिक जन असंतोष दबाने के उद्देश्य से बांटा जाने वाला सस्पेंशन का चूरन पुराना हो चला है। वे दिन गए जब सरकारी सेवा में शुचिता और ईमानदारी सर्वोपरि थी। जमाना बदल गया है। ईमानदारी बेईमानी का मौका मिलने तक ही सीमित रहती है। सस्पेंड होना तो अब सामाजिक दाग की संज्ञा से भी बाहर हो गया है।
आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं मगर सामान्य धारणा यही है कि सस्पेंशन के मामलों में बिरले लोगों का ही गंभीर सजा मिलती है। मामला ठंडा होते ही व्यक्तिगत संपर्क, राजनीतिक वरदहस्त अपना काम करते हैं, आरोपी निर्दोष बरी होते हैं और मजे से बिना काम की पूरी तनख्वाह उठाते हैं। सरकारी सेवकों के मन में दंड के माध्यम से भी जिम्मेदारी का भाव पैदा किया जाना जरूरी है। जरूरत सस्पेंशन रूपी चूरन नहीं बल्कि कड़वी दवाई की है। कम से कम कांच की तरह स्पष्ट मामलों में त्वरित कार्रवाई कर बर्खास्तगी जैसे कदम उठाने से ही काम चलेगा। अगर नियमों का अवरोध है तो उसे दूर किया जाना चाहिए। जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो देर हो जाएगी और अफसरों नेताओं व्यपारियों का ये गठबंधन लोगों को मौत की नींद सुलाता रहेगा। जैसी कि जानकारी मिली है कि सागर में अवैध शराब बेचने वालों के सर पर स्थानीय सत्तारूढ़ दल के नेताओं का हाथ था ऐसे नेताओं पर भी कड़ी कार्यवाही कर उन्हें भी आरोपी बनाया जाना चाहिए तभी राजनीति में शुचिता आ सकेगी लेकिन सवाल तो वही है कि पहल कौन करेगा शायद इसका उत्तर ‘कोई नहीं’ ही होगा।

Author: Jai Lok





