
जबलपुर/जयलोक। आदिवासी समाज के लिए गढ़ा मंडला राज्य की महान वीरांगना रानी दुर्गावती तथा गौड़ वंश के अंतिम शासक राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह का बलिदान अविस्मरणीय बनाने में जिन लोगों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया उनमें मित्र संघ और दैनिक जयलोक के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार श्री अजित वर्मा जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने गढ़ा मंडला राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान स्थल बारहा में समाधि स्थल पर 55 वर्ष पूर्व 1971 में मित्र संघ की ओर से वीरांगना का बलिदान दिवस मनाने की शुरुआत कराई। वे कई वर्षों तक मित्र संघ की ओर से थोड़े से लोगों को साथ लेकर बलिदान दिवस मनाते रहे। 1975 में भंवर लाल पार्क में महापौर श्री बाबूराव परांजपे के प्रयासों से वीरांगना दुर्गावती की प्रतिमा की स्थापना में श्री अजित वर्मा ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। फिर मित्र संघ की ओर वीरांगना के बलिदान दिवस के आयोजन समाधि और प्रतिमा स्थल पर होने लगे। अब वीरांगना के बलिदान दिवस को भव्य रूप में आयोजित करने का सिलसिला शुरू हुआ है। इसी तरह से अजित वर्मा ने गौड़वंश के अंतिम शासक राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह जिन्हें की अंग्रेज शासकों ने तोप से बांधकर उड़ा दिया था उस स्थल की खोज भी श्री अजित वर्मा ने एल्गिन अस्पताल के सामने की और वहां पर मित्र संघ की ओर से एक स्तंभ का निर्माण भी करवाया। 18 सितंबर 1857 के दिन राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह का बलिदान हुआ और उनके बलिदान स्थल पर श्री वर्मा ने मित्र संघ की ओर से बलिदान दिवस मनाने की परंपरा 55 वर्ष पूर्व शुरू की। श्री अजित वर्मा ने लगातार राजा शंकर शाह रघुनाथ शहर के बलिदान दिवस को भव्यता से आयोजित कराने की दिशा में प्रयास किये। उन्होंने वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व विधायक नन्हेंलाल धुर्वे से आग्रह किया कि वह आदिवासी समाज को राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह का बलिदान दिवस मनाने के लिए प्रेरित करें और यह सुखद संयोग रहा कि आदिवासी समाज भी राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह का बलिदान दिवस आयोजित करने में अग्रणी भूमिका निभाने लगा। श्री वर्मा के आग्रह पर तत्कालीन महापौर श्री विश्वनाथ दुबे ने राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह की प्रतिमा की स्थापना कराई। इस प्रतिमा के अनावरण अवसर पर राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह के बलिदान स्थल की खोज के लिए महापौर श्री दुबे ने मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से उनका अभिनंदन भी कराया। फिर तो प्रतिमा स्थल पर बलिदान दिवस के भव्य स्तर पर आयोजन की शुरुआत हुई। अभी राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह का 169 वां बलिदान दिवस बड़े स्तर पर मनाया गया जिसमें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव भी सम्मिलित हुए।
पिता -पुत्र का प्रेरक बलिदान
राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह के बलिदान के संबंध में श्री अजित वर्मा ने लिखा है कि स्वतंत्रता के यज्ञ कुंड में वीरांगना रानी दुर्गावती की प्राणाहुति गोंड़वंश द्वारा दी जाने वाली अंतिम आहुति नहीं थी। राजा शंकर शाह एवं उनके युवा पुत्र रघुनाथ शाह ने भी 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय अपने जीवन का बलिदान कर इतिहास को गौरव प्रदान किया। राजा शंकर शाह जबलपुर नगर के निकट पुरवा ग्राम में सपरिवार निवास करते थे। जबलपुर सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला की लपेट में आता जा रहा था। राजा शंकर शाह के साथ वंश की प्राचीन प्रतिष्ठा थी और क्रांतिकारी उनके नेतृत्व में संघर्ष का बिगुल फूंकने की तैयारी में जुटे थे। कई महत्वपूर्ण जमींदार और 52 वीं रेजीमेंट के सैनिक दशहरा के समय विद्रोह का श्री गणेश करने को तैयार थे। जबलपुर के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर के अनेक हिंदुस्तानी भेदिए थे जिन्हें देश की स्वतंत्रता एवं आन-बान से कोई वास्ता नहीं था। डिप्टी कमिश्नर के चपरासी ने फकीर का वेश बनाकर राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह के संकल्प का पता लगा लिया। राजा शंकर शाह अंग्रेजी शासन की आंख का कांटा बन गए। लेफ्टिनेंट क्लार्क 20 सशस्त्र घुड़सवारों एवं शक्तिशाली पुलिस दस्ते के साथ पुरवा ग्राम पर चढ़ाई कर दी। राजा शंकर शाह एवं उनके युवा पुत्र रघुनाथ शाह को कैद कर लिया गया इन्हें छावनी के कारागृह में रखा गया। बाद में सैनिक छावनी से इन दोनों पिता पुत्रों को एल्गिन अस्पताल के सामने स्थित ओल्ड रेजीडेंसी में बंद कर दिया गया। 18 सितंबर 1857 के दिवस 11.00 बजे ओल्ड रेजिडेंसी के कुछ 100 गज दूर दो तोपें खड़ी की गई। 33वीं अंग्रेज रेजीमेंट एवं मद्रास की घुड़सवार सेना तैनात थी। राजा शंकर शाह एवं उनके पुत्र रघुनाथ शाह तोप के मुंह से बांध दिए गए। दृढ़ संकल्प एवं निर्भयता उनके चेहरे पर खेल रही थी। विधि का विधान था कि पिता एवं पुत्र दोनों एक साथ तथा एक ही समय मृत्यु का वरण करने जा रहे थे। जैसे ही दोनों तोपें दागी गईं मांस के लोथड़े मैदान में बिखर गए। चील और गिद्धों ने इन लोथडो़ंं से अपनी भूख मिटाई। बाकी लोथड़े बटोरने की अनुमति रानी को दे दी गई। रानी ने व्यथित हृदय से उन हड्डियों एवं मांस के लोथड़ों को बटोर लिया जिनसे किसी समय उसके पति एवं पुत्र के सुडौल शरीर बने थे। श्री अजित वर्मा लिखते हैं कि राजा शंकर शाह एवं उनके पुत्र रघुनाथ शाह का अमर बलिदान भारतीय इतिहास की एक गौरवशाली गाथा है उनकी पावन स्मृति देश एवं समाज की अप्रतिम धरोहर है।
Author: Jai Lok






