
नई दिल्ली। चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद और मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे में आ गई है। २०२३ में बनाए गए नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में ही इस बात पर मतभेद सामने आया कि क्या मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इस बिंदु पर अलग-अलग राय पर पहुंचे।
इसी बीच एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले १० महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर कम से कम १४ बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दों से संबंधित थीं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन दावों को अलग तरीके से प्रस्तुत करते हुए कहा कि आंतरिक टिप्पणियां और अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं, और सभी अंतिम फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए हैं। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने २०२३ के कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन पैनल की संरचना पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मौजूदा व्यवस्था में प्रधानमंत्री, केंद्र सरकार के एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। जस्टिस दत्ता ने आपत्ति जताई कि सरकार के कैबिनेट मंत्री से पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। दिसंबर २०२३ में संसद ने नया कानून बनाकर इस समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर केंद्र सरकार के एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया। इसी बदलाव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि चुनाव आयुक्तों संधू और जोशी की आपत्तियों में फार्म-६ में बदलाव और मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक पहुंच जैसे विषय शामिल थे, तथा दोनों अधिकारियों ने कुछ मामलों में बदलावों की वैधानिकता पर भी सवाल उठाए। इस पर आयोग ने प्रतिक्रिया दी कि आंतरिक टिप्पणियों को अलग करके देखने से पूरी निर्णय प्रक्रिया की तस्वीर सामने नहीं आती, और सभी अंतिम निर्णय पूर्ण आयोग की सहमति से ही लिए गए।सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मतभेद के बाद अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पहुंचा है, जो तय करेंगे कि क्या इसकी सुनवाई बड़ी संविधान पीठ करेगी। जस्टिस शर्मा ने बड़ी पीठ के विचार का समर्थन किया, जबकि जस्टिस दत्ता ने कहा कि मौजूदा पीठ भी संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर सकती है। इस पूरे घटनाक्रम में दो मुख्य प्रश्न उभरकर सामने आए हैं। पहला, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका की सीमा क्या होनी चाहिए, और दूसरा, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसे संचालित होनी चाहिए।
Author: Jai Lok






