
संजय पाठक के परिवार से जुड़ी कंपनी पर जबलपुर कलेक्टर ने लगाया भारी-भरकम जुर्माना
जबलपुर (जयलोक)। मप्र हाईकोर्ट से संजय पाठक के परिवार से जुड़ी कंपनी मेसर्स आनंद माइनिंग कॉरपोरेशन को बड़ा झटका लगा है। अदालत ने अवैध उत्खनन के मामले में प्रस्तावित लगभग साढ़े चार सौ करोड़ रुपये के जुर्माने की कार्रवाई को चुनौती देने वाली कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट की युगलपीठ न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति बी.पी.शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि इस मामले में जिला कलेक्टर सभी पक्षों और आपत्तियों को सुनने के बाद कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के लिए सक्षम हैं। अदालत ने कलेक्टर को चार महीने के भीतर इस पूरे प्रकरण का निराकरण करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में सरकार की ओर से अधिवक्ता कार्यालय ने पुरजोर तरीके से विरोध दर्ज कराते हुए लगाये गये जुर्माने की कार्रवाई को उचित ठहराया है।

यह है पूरा मामला- याचिकाकर्ता कंपनी आनंद माइनिंग कॉरपोरेशन की तरफ से पैरवी करते हुए कहा गया था कि वे जबलपुर की तहसील सिहोरा के अंतर्गत आने वाले टिकरिया और प्रतापपुर गांवों में स्थित लौह अयस्क खदानों का संचालन माइनिंग लीज के आधार पर कर रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा 23 अप्रैल 2025 को खदान के निरीक्षण के लिए एक जांच समिति का गठन किया गया था। इस कमेटी ने साल 2004 से 2017 के दौरान कथित तौर पर तय सीमा से अधिक खनन किए जाने की रिपोर्ट सौंपी थी।

इसी रिपोर्ट के आधार पर कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, जिसमें टिकरिया खदान के लिए 1,13,81,94,280 रुपये और प्रतापपुर के मामले में 1,20,69,41,910 रुपये की वसूली का प्रस्ताव दिया गया था। कंपनी ने जांच समिति के गठन और उसकी कानूनी वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि पूरी कार्यवाही अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर मनमानी तरीके व कानून के खिलाफ की गई है। जांच समिति का गठन किसी कानूनी प्रावधान या सही तरीके से सौंपे गए कानूनी अधिकार के तहत नहीं किया गया है। इसलिए उनकी रिपोर्ट माइनिंग एक्ट, 1957 की धारा 21(5) के तहत कार्यवाही का आधार नहीं बन सकती। यह तर्क दिया गया है कि धारा 21(5) खनिज की कीमत, रॉयल्टी या टैक्स वसूलने की शक्ति राज्य सरकार को देती है और कलेक्टर बिना किसी खास अधिकार के ऐसा अधिकार-क्षेत्र नहीं अपना सकते। उच्च न्यायालय ने कलेक्टर जबलपुर को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता के पक्ष को सुनने के पश्चात् कानून के अनुसार 4 महीने के भीतर कार्रवाई को अंतिम रूप से निपटायें।

Author: Jai Lok






