
अभय गोरे
जबलपुर (जयलोक)। दीक्षितपुरा में राजासागर मार्ग पर ‘अनंत आश्रम परांजपे बाडा’ स्थित है। जबलपूर के लोकप्रिय सांसद रहे दादा बाबूराव परांजपे इसी परिवार से थे। इस परिवार के देवघर में ‘अनादि निर्गुण प्रगटली भवानी…’ जैसा भक्तिमय स्वर गूंजने लगता है, और ‘किती रम्य वेळ ही तिन्हीसांज बघ झाली, ही महालक्ष्मी आज घरासी आली’ (कितनी रमणीय संध्या गोधुली की यह बेला है, यह महालक्ष्मी आज घर आई है) की आरती गाई जाती है, तब मन मंत्रमुग्ध हो जाता है। ‘आला गोंधळी गोंधळ घालाया’ के गोंधळ (पारंपरिक भक्ति नृत्य) की ताल पर कदम थिरकने लगते हैं और ‘अष्टमीचा चंद्रमा आला गडे’ की आरती से पूरा शरीर झूमने लगता है। दीक्षितपुरा के परांजपे परिवार के लगभग 50 लोग जब एक साथ आकर झांझ और तबले की संगत में आरती के लिए खड़े होते हैं, तो वह दृश्य और वह सामूहिक आरती वास्तव में शब्दातीत और अद्वितीय होती है। एक ही रक्त और एक ही संस्कृति की इतनी बड़ी पीढ़ी जब एक स्वर और एक लय में आदिशक्ति की आराधना करती है, तो वह केवल एक पारिवारिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि वह पीढिय़ों से चले आ रहे सुसंस्कारों और एकजुटता का एक भव्य महोत्सव बन जाता है। ननिहाल का देवघर केवल लकड़ी का एक कोना या दीवार का आला मात्र नहीं होता, बल्कि वह इसी निष्काम भक्ति और पूर्वजों की पवित्र स्मृतियों से महकता हुआ घर का अखंड गर्भगृह होता है।
लगभग 150 वर्ष पूर्व कोंकण के रत्नागिरी जिले के आडिवरे गांव से मध्य प्रदेश के जबलपुर जैसे हिंदी भाषी क्षेत्र में स्थानांतरित हुए परांजपे परिवार की यह एक जीवंत यशोगाथा है। भौगोलिक दूरियां बदल गईं, आसपास की भाषा और संस्कृति बदल गई, लेकिन परांजपे परिवार ने अपने देवघर की पवित्रता, परिवार की एकजुटता और कुल की परंपरा में तनिक भी बदलाव नहीं आने दिया। जिस देवघर में वर्षों तक नानीजी ने तडक़े उठकर मनोभाव से पूजा-अर्चना की, नानाजी ने जिस समयी (दीपक) के प्रकाश में ईश्वर का नाम जप किया, और उसके बाद चचेरी सारजा नानी ने भी जिस पवित्र परंपरा की विरासत को जीवंत रखा; वह देवघर इस 150 वषोज़्ं के प्रवास और संस्कृति-रक्षण का सबसे बड़ा साक्षी है। आज विलास परांजपे एवं श्रीमती अंजू परांजपे उसी श्रद्धा, अपनेपन और गर्व के साथ उस देवघर के नंदादीप (अखंड ज्योति) और परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखने वाली परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।घर के इस पावन गर्भगृह पर सबसे बड़ा वरदहस्त रत्नागिरी जिले के आडिवरे गांव की साक्षात आदिशक्ति महालक्ष्मी का है। कोंकण की उस पवित्र भूमि से, आडिवरे के जागृत और तेजोमय पीठ से मानो परांजपे परिवार के साथ ही चली आई यह महालक्ष्मी केवल एक मूर्ति के रूप में वहां विराजमान नहीं हैं, बल्कि वह परप्रांत में भी पूरे परिवार की रक्षा करने वाली, उन्हें स्थायित्व और समृद्धि देने वाली माता के रूप में वहां विराजमान हैं। उन्हीं के सांत्वनापूर्ण सानिध्य में एक ओर जहां श्रीवि_ल के चरण और पांडुरंग की सात्विकता विद्यमान है, वहीं दूसरी ओर सृष्टि की रचना करने वाली गायत्री माता का तेज और वैराग्यमूर्ति शिव का ध्यान एक ही छत के नीचे समाहित है। भक्ति का ऐसा सर्वसमावेशी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा और संस्कृति को संजोकर रखने वाला संगम ही एक सच्चे देवघर का लक्षण है।
घर का यह श्रद्धास्थान केवल फूल-पत्तियों से सजा हुआ न हो, बल्कि इसके साथ ज्ञान और अद्भुत इतिहास का जुड़ाव भी होना चाहिए। इस देवघर का सबसे बड़ा वैभव पीतल की पेटी में अत्यंत सुरक्षित रखी गई ‘सप्तशती की पोथी’ (दुर्गा सप्तशती का हस्तलिखित ग्रंथ) है। पूर्वजों द्वारा अपने हाथों से लिखा गया वह एक-एक अक्षर केवल कागज़ पर उकेरी गई स्याही नहीं है, बल्कि वह परांजपे परिवार की एक लिखित सात्विक धरोहर है। जब यह हस्तलिखित पोथी उस देवघर में सम्मानपूर्वक विराजमान होती है, तब उसके शब्दों और पूर्वजों के उस हस्तलेखन से साक्षात विद्या और परंपरा का अधिष्ठान हिंदी भाषी प्रदेश में भी मराठी संस्कृति की गवाही देता हुआ खड़ा दिखाई देता है।
लेकिन यह भक्ति केवल कोमल या दुर्बल नहीं होनी चाहिए; इसकी रक्षा के लिए वहां तलवार और त्रिशूल जैसे शस्त्र भी उतने ही स्वाभिमान से चमक रहे हैं। ये शस्त्र केवल धातु के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि ये दुष्टों का संहार करने वाली ‘शक्ति’ और आत्मसम्मान के प्रतीक बनकर वहां खड़े हैं, जो पराये प्रांतीय परिवेश में भी परिवार को विपत्तियों से लडऩे और डटे रहने का आत्मबल प्रदान करते हैं।नवरात्रि की नौ रातों में जब उस देवघर में नंदादीप अखंड प्रज्वलित रहता है, तब उसकी वह मंद, शांत और प्रकाशमान लौ केवल अंधकार को दूर नहीं करती, बल्कि मनुष्य के मन के अज्ञान रूपी अंधकार को भी नष्ट कर देती है।
150 वर्ष पूर्व जलाई गई भक्ति की यह ज्योति और पीतल की पेटी में पीढिय़ों से सुरक्षित रखी गई वह हस्तलिखित पोथी आज भी उतने ही तेज से दैदीप्यमान है। पीढिय़ां बदल गईं, शहर बदल गए; लेकिन घर के मूल्य, पारिवारिक स्नेह और कुलाचार (कुल की परंपराएं) कभी बदलने नहीं देनी चाहिए।






