
भारत में दीपावली केवल रोशनी , खुशियों, धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है। बल्कि यह पर्व देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाले सबसे बड़े आर्थिक अवसरों में से एक है। दीपावली का त्यौहार आते ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। कारोबारियों के चेहरे खिल उठते हैं और उपभोक्ताओं की खरीदारी से अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। वास्तव में दीपावली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े आर्थिक उत्सव से कम नहीं है। दीपावली का आर्थिक प्रभाव देश के लगभग हर क्षेत्र में दिखाई देता है। सोने चाँदी के आभूषणों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान, वाहन, कपड़े, मिठाइयाँ, सजावटी वस्तुएं,घरेलू उपकरण और उपहारों तक की खरीदारी में तेजी आती है। बाजारों में ग्राहकों की भीड़ बढ़ती है और छोटे बड़े व्यापारियों के कारोबार में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिलता है। यही कारण है कि व्यापारी पूरे वर्ष दीपावली के त्यौहार का इंतजार करते हैं। इस पर्व का सबसे बड़ा लाभ छोटे कारोबारियों , कुटीर उद्योगों, हस्तशिल्पकारों, कुम्हारों और स्थानीय उत्पादकों को मिलता है।

मिट्टी के दिये बनाने वाले कारीगरों से लेकर सजावटी सामान तैयार करने वाले शिल्पकारों तक लाखों लोगों की आजीविका दीपावली के बाजार से जुड़ी होती है। इसके अलावा परिवहन, पैकेजिंग, डिलीवरी और अस्थाई रोजगार के क्षेत्र में भी काम के अवसर बढ़ते हैं। इस तरह दीपावली केवल खरीददारी का अवसर नहीं बल्कि रोजगार और स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने वाला पर्व भी है। सरकार की वोकल फार लोकल और आत्मनिर्भर भारत की सोच को आगे बढ़ाने में भी दीपावली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि देशवासी स्थानीय कारीगरों के बनाए दिये , सजावटी सामान, कपड़े और स्वदेशी उत्पादन खरीदें तो इसका सीधा लाभ भारतीय उद्योगों और छोटे उद्योगों को मिलेगा। इससे देश के भीतर पूंजी का प्रभाव बढ़ेगा और स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा। हालांकि दीपावली के आर्थिक उत्साह के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। अनावश्यक खर्च, महँगाई, मिलावटी मिठाइयाँ, पर्यावरण प्रदूषण और विदेशी उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता जैसे विषयों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। त्यौहार की खुशियां तभी सार्थक होंगी, जब खरीदारी जिम्मेदारी के साथ हो और उसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचे । आज आवश्यकता इस बात की है कि दीपावली को केवल दिखावे का पर्व न बनाकर आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सहयोग का माध्यम बनाया जाए। देश के नागरिक यदि स्थानीय बाजारों से खरीददारी को प्राथमिकता दें , स्वदेशी उत्पादों को अपनायें और जरूरतमंदों के साथ त्यौहार की खुशियां साझा करें तो दीपावली भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में और अधिक प्रभावी साबित हो सकती है। निसंदेह दीपावली भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ उसकी आर्थिक शक्ति का भी प्रतीक है।

यह पर्व हमें बताता है कि जब करोड़ों लोग एक साथ खरीदारी करते हैं, कारोबार करते हैं और उत्पादन को प्रोत्साहित करते हैं , तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। दीपों की यह जगमगाहट केवल घरों को ही नहीं रोशन करती, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी और देश की आर्थिक संभावनाओं को भी रोशनी देता है। दीपावली का असली संदेश सही होना चाहिए कि हर घर में दीप जले और हर हाथ को काम मिले, हर व्यापारी के चेहरे पर मुस्कान आए और भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता तथा समृद्धि की नई ऊँचाइयों को छुए। दैनिक जयलोक के सभी पाठकों, विज्ञापनदाताओं और शुभचिंतकों को दैनिक जयलोक की ओर से दीपावली के पर्व की बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं।
संच्चिदानंद शेकटकर
प्रधान संपादक
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